मौर्यकालीन सामाजिक स्थिति

मौर्यकाल में समाज व्यवसाय के आधार पर 7 श्रेणियों में बंटा हुआ था, यह साथ श्रेणियां दार्शनिक, किसान, शिकारी एवं पशुपालक, शिल्पी एवं कारीगर, योद्धा, निरीक्षक एवं गुप्तचर तथा अमात्य और सभासद थीं। इस दौरान अधिकतर लोगों का व्यवसाय कृषि था।
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में समाज की चारों वर्गों का उल्लेख ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के रूप में किया है। कौटिल्य ने शूद्रों को आर्य कहा है तथा उन्हें मलेच्छों से भिन्न बताया है। अर्थशास्त्र में कृषि, पशुपालन और व्यापार को शूद्रों का व्यवसाय बताया गया है। कौटिल्य ने कई मिश्रित जातियों का भी उल्लेख किया है, उनकी उत्पति विभिन्न वर्णों के अनुलोम व प्रतिलोम विवाहों से हुई थी।
मौर्यकाल में मदिरा पान, जुआ व शिकार मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। इस दौरान रंगशालाएं भी अस्तित्व में थीं।
मौर्यकाल में स्त्रियों की स्थिति
मौर्यकाल में स्त्रियों का स्थान अपेक्षाकृत संतोषजनक था। उन्हें इस दौरान काफी स्वतंत्रता प्राप्त थी। स्त्रियों को पुनर्विवाह और नियोग की अनुमति दी गयी थी। स्त्रियाँ प्राय घर में ही रहती थीं, इस प्रकार की स्त्रियों को कौटिल्य ने अनिष्कासिनी कहा है। अर्थशास्त्र के अनुसार विवाह के लिए स्त्री की आयु 12 वर्ष तथा पुरुष की आयु 16 वर्ष होनी चाहिये। मौर्यकाल में दहेज़ प्रथा काफी प्रचलित थी। स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने वाली विधवाओं को छंदवासिनी तथा धनी विधवा को आढय कहा जाता था।
मौर्यकाल में स्त्रियाँ गुप्तचर का कार्य भी करती थीं। स्त्रियाँ सम्राट की अंगरक्षिका का कार्य भी करती थी। अर्थशास्त्र में ऐसी स्त्रियों के लिए असूर्यपश्या, अवरोधन तथा अंतःपुर शब्दों का प्रयोग किया गया है। मौर्यकाल में स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार प्राप्त था।
धार्मिक स्थिति
धार्मिक दृष्टि से मौर्य काल में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इस दौरान बौद्ध धर्म का काफी विस्तार हुआ और उसे कई शासकों का संरक्षण भी प्राप्त हुआ। मौर्यकाल में वैदिक धर्म भी प्रचलित था। इस दौरान वैदिक धर्म में कर्मकांड काफी बढ़ गए थे। मौर्यकाल में यज्ञ इत्यादि कर्मकांड काफी प्रचलित थे।
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में जैन धर्म को स्वीकार किया था। जबकि सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था। उसके बाद अशोक ने दक्षिण एशिया व अन्य क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए काफी प्रयत्न किये। आरम्भ में अशोक वैदिक धर्म का अनुयायी थी, कई अभिलेखों में उसे देवानाम्प्रिय कह कर संबोधित किया गया है। बौद्ध धर्म का अनुयायी होने पर भी अशोक सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु था।

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