केन्द्रीय कैबिनेट ने ट्रिपल तलाक को दंडनीय अपराध बनाने के लिए अध्यादेश को पुनः मंज़ूरी दी

केन्द्रीय कैबिनेट ने ट्रिपल तलाक को दंडनीय अपराध बनाने के लिए अध्यादेश को पुनः मंज़ूरी दे दी है। इससे पहले ट्रिपल तलाक़ पर जारी किये गये अध्यादेश की अवधि 22 जनवरी को समाप्त हो रही है। पिछली बार सितम्बर में ट्रिपल तलाक़ पर अध्यादेश जारी किया गया था। हालाँकि केंद्र सरकार ने ट्रिपल तलाक पर विधेयक को पारित करने प्रयास किया, परन्तु अभी यह बिल राज्यसभा में विपक्ष के विरोध के चलते लटका हुआ है।

मुख्य बिंदु

इस अध्यादेश के द्वारा ट्रिपल तलाक को गैर-कानूनी बनाया गया है। ट्रिपल तलाक के लिए आरोपी पुरुष को तीन साल कारावास की सजा दी जा सकती है। इस अध्यादेश का दुरूपयोग रोकने के लिए जमानत की व्यवस्था भी है। ट्रिपल तलाक का मामला तभी संज्ञान लेने योग्य होगा जब पीड़ित अथवा उसके सगे-सम्बन्धियों द्वारा FIR दर्ज करवाई जायेगी। ऐसे मामले में केवल पीड़ित के आग्रह पर ही समझौता किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त पीड़ित अपने अल्पव्यस्क बच्चों की कस्टडी भी ले सकती है और इसके लिए उसे गुज़ारा भत्ता भी देय होगा।

पृष्ठभूमि

अगस्त, 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक की इस्लामिक प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया था। इस प्रथम के तहत मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी को केवल तीन बार तलाक शब्द बोलकर तलाक दे सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को धार्मिक परंपरा के अभिन्न हिस्सा होने की दलील को भी अस्वीकार किया। इस पर कानून बनाने के लिए सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह सम्बन्धी अधिकारों की सुरक्षा) बिल, 2017 लोक सभा में दिसम्बर, 2017 में पारित किया था। परन्तु विपक्षी दलों से सहमती न बनने यह बिल राज्य सभी में अभी लटका हुआ है।

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