डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया पहली बार पहुंचा 70 पर

भारतीय रुपया 14 अगस्त, 2018 को डॉलर के विरुद्ध अपने न्यूनतम स्तर 70.07 पर पहुंचा। परन्तु बाद में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा काफी हस्तक्षेप किये जाने के बाद यह  69.84 पर पहुंचा। भारतीय रूपये के अवमूल्यन के मुख्य कारण तुर्की की मुद्रा ‘लीरा’ का अत्याधिक अवमूल्यन है।

मुख्य बिंदु 

तुर्की की विपरीत राजनीतिक व आर्थिक परिस्थितियों के कारण तुर्की की मुद्रा ‘लीरा’ का अत्याधिक अवमूल्यन हो रहा है। पिछले एक वर्ष में लीरा डॉलर के मुकाबले 50% नीचे गिरी है। तुर्की में मुद्रास्फीति बढ़ने के कारण आर्थिक गतिविधियाँ चरमरा गयी हैं, जून 2018 में मुद्रास्फीति की वार्षिक दर लगभग 16% थी। तुर्की का विदेशी ऋण लगातार बढ़ रहा तथा इसका चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी अधिक है। वर्तमान में तुर्की की सरकार तथा केन्द्रीय बैंक की विश्वसनीयता में कमी आई है। इसके अलावा निर्माण क्षेत्र भी बुरे दौर से गुज़र रहा है, जिससे तुर्की के कमज़ोर बैंकिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ रहा है।

भारतीय रूपये पर प्रभाव

2018 में भारतीय रुपये में 9% की गिरावट आई है। तुर्की की मुद्रा लीरा में भारी गिरावट के कारण निवेशकों ने सुरक्षा के तौर पर बड़ी मात्रा में मुद्रा का विक्रय किया। इससे भारतीय रूपये में भी गिरावट आई। हालांकि भारतीय रूपये में गिरावट का कारण बाहरी है और यह अस्थायी है। यदि भविष्य में किसी अन्य वैश्विक मुद्रा में गिरावट आती है तो इससे भारतीय रूपया और नीचे गिर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अत्याधिक होने के कारण सभी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर काफी आश्रित हैं, इसलिए एक अर्थव्यवस्था में होने वाली सकारात्मक अथवा नकारात्मक घटना का असर दूसरी सम्बंधित अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

रुपये में गिरावट के परिणाम

आयात : भारतीय रूपये के कमज़ोर होने के कारण आयातकों को काफी नुकसान होगा, आयात करने के लिए भारतीय कंपनियों तथा सरकार को पहले के मुकाबले अधिक राशी अदा करनी पड़ेगी।

निर्यात : भारतीय रुपये के कमज़ोर होने से आयातकों को लाभ होगा, डॉलर को रुपये ने कन्वर्ट करने से आयातकों को पहले की मुकाबले अधिक अधिक राशी मिलेगी।

अर्थव्यवस्था : भारतीय रुपये में गिरावट होने के कारण आयात महंगे हो जायेंगे। इससे तेल की कीमतें बढेंगी (भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है), इससे भारत के चालू खाता घाटा पर दबाव पड़ेगा।

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