अर्थव्यवस्था करेंट अफेयर्स

कैबिनेट ने दी रियायती वित्त योजना के विस्तार को मंज़ूरी

केन्द्रीय कैबिनेट ने रियायती वित्त योजना (CFS) के 5 वर्ष (2018 से 2023) के विस्तार को मंज़ूरी दी। इसका उद्देश्य विदेश में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अधोसंरचना परियोजनाओं में भारतीय कंपनियों को कार्य करने के लिए बढ़ावा देना है।

मुख्य बिंदु

इस योजना के तहत विदेश मंत्रालय द्वारा अन्य देशों में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण कुछ एक प्रोजेक्ट्स को चुना जाता है। इस प्रोजेक्ट्स की सूची को आर्थिक मामले विभाग को भेजा जाता है। प्रोजेक्ट के सामरिक महत्व का निर्णय सचिव के अध्यक्षता में एक समिति द्वारा किया जाता है। इस समिति के सदस्य वित्त मंत्रालय, औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग, वाणिज्य मंत्रालय, गृह मंत्रालय व उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होते हैं। इस प्रोजेक्ट को अनुमति मिलने के बाद आर्थिक मामले विभाग द्वारा यह सूचना को आयात निर्यात बैंक (EXIM) को दी जाती है।

इस योजना का क्रियान्वयन एक्सिम बैंक द्वारा किया जाता है, एक्सिम बैंक प्रोजेक्ट्स के लिए रियायती वित्त उपलब्ध करवाता है। केंद्र सरकार द्वारा एक्सिम बैंक को काउंटर गारंटी व 2% समकारी ब्याज़ सहायता दी जाती है।

पृष्ठभूमि

रियायती वित्त योजना से पहले भारतीय कंपनियां वित्त की कमी के कारण विदेशों में बड़े प्रोजेक्ट्स में कार्य करने में सक्षम नहीं थी। आमतौर पर जापान, चीन, यूरोप तथा अमेरिका के कंपनियां इस तरह के प्रोजेक्ट्स को प्राप्त करती थीं। विदेशों में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए भारतीय कंपनियों को सहायता देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने यह योजना 2015-16 में लांच की गयी थी।

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लोक सभा ने पारित किया दिवालिया और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) बिल, 2018

लोक सभा ने दिवालिया और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) बिल, 2018 पारित किया। इसका उद्देश्य कंपनियों व लोगों की दिवालियापन की प्रक्रिया का समयबद्ध तरीके से करना है। दिवालियापन वह स्थिति है जब जब कोई कंपनी अथवा व्यक्ति अपने ऋण का भुगतान करने की स्थिति में नहीं होता। सरकार ने नवम्बर, 2017 में दिवालियापन कानून समिति का गठन किया था। इस समिति द्वारा कई सुझाव प्रस्तुत किये गये थे। इसके बाद जून 2018 में दिवालियापन और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अध्यादेश राष्ट्रपति द्वारा लागू किया गया था।

मुख्य बिंदु

इस बिल में रियल एस्टेट के संबध में आबंटी की स्थिति को स्पष्ट किया गया है, इसके अनुसार निर्माणाधीन भवन इत्यादि के क्रेता को वित्तीय लेनदार माना जायेगा

इस बिल में किसी वर्ग से ऋण लेने पर वित्तीय लेनदारों का प्रतिनिधित्व लेनदारों की एक समिति द्वारा किया जायेगा। यह प्रतिनिधि वित्तीय लेनदारों की ओर से वोट करेंगे। इसके अलावा लेनदारों की समिति की वोट की सीमा 75% से कम करके 51% प्रतिशत कर दी गयी है।

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