पर्यावरण एवं पारिस्थिकी करेंट अफेयर्स

राष्ट्रीय जैव इंधन नीति की क्रियान्वयन अपडेट्स

केन्द्रीय पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने जून, 2018 में राष्ट्रीय जैव इंधन नीति के सन्दर्भ में अधिसूचना जारी की थी। 18 नवम्बर, 2018 को केन्द्रीय पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस नीति के क्रियान्वयन के सन्दर्भ में लोकसभा में लिखित जवाब दिया है।

सरकार द्वारा उठाये गये कदम तथा उपलब्धियां

  • 2013-14 में पेट्रोल में 1.53% एथेनॉल मिलाया जाता था, 2017-18 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण की दर 4.22% कर दी गयी है।
  • 2018-19 के लिए भारत सरकार ने निर्धारित 225 करोड़ रुपये लीटर के मुकाबले अभी तक 180 करोड़ लीटर एथेनॉल की खरीद की है।
  • देश की वार्षिक एथेनॉल उत्पादन क्षमता 335 करोड़ लीटर है।

जैव इंधन पर मौजूदा सरकारी योजनायें

  • Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation स्कीम के तहत देश भर में 2023 तक 5000 संपीडित बायो गैस प्लांट्स की स्थापना की जाएगी।
  • एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम में शामिल तेल मार्केटिंग कंपनियां अधिकतम 10% मिश्रित एथेनॉल के साथ पेट्रोल बेच सकती हैं।

राष्ट्रीय जैव इंधन नीति, 2018

इस नीति में जैव इंधन को प्रथम पीढ़ी (1G), द्वितीय पीढ़ी (2G) और तृतीय पीढ़ी (3G) में विभाजित किया गया है। इसमें प्रत्येक श्रेणी को उचित वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य किसानों को अतिरिक्त स्टॉक से लाभदायक तरीके से निजात दिलाना और देश के तेल के आयात को कम करना है। इसके लिए सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल की नयी श्रेणी को अनुमति दी, इसमें प्रमुख फसलें हैं : गन्ना रस, मक्की, कसावा तथा अन्य स्टार्च युक्त अन्न जिसका उपयोग मानव उपभोग के लिए नहीं किया जा सकता।

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GCF ने भारत के तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए 43 मिलियन डॉलर की राशि को मंज़ूरी दी

ग्रीन क्लाइमेट फण्ड (GCF) ने भारत के तटीय क्षेत्रों में निवास करने वाले समुदायों द्वारा जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए 43.4 मिलियन डॉलर की राशि को मंज़ूरी दे दी है।  इस राशि का उपयोग विभिन्न देशों में भू-तापीय उर्जा तथा तटीय समुदायों के संरक्षण इत्यादि के लिए किया जायेगा।

मुख्य बिंदु

GCF द्वारा फण्ड किया जाने वाला यह प्रोजेक्ट बहु-आयामी है, इस प्रोजेक्ट के तहत आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा ओडिशा के संवेदनशील इलाकों पर फोकस किया जायेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत इन राज्यों को जलवायु परिवर्तन के मुताबिक समुदायों को ढालने तथा उत्सर्जन में कमी करने के लिए कार्य किया जायेगा। इसके अलावा स्थानीय समुदाय की आजीविका के लिए भी व्यवस्था की जाएगी। यह प्रोजेक्ट को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के द्वारा भी सहायता दी जाएगी। इस प्रोजेक्ट के तहत 15,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मंग्रोव, कोरल रीफ, सीग्रास तथा नमक युक्त दलदल के संरक्षण के लिए कार्य किया जायेगा। इसके लिए स्थानीय युवाओं को वैज्ञानिकों के साथ कार्य करने के लिए प्रशिक्षण दिया जायेगा।

इसके अलावा इस कार्य में समन्वय के लिए सरकारी अफसरों, शैक्षणिक संस्थानों, सामुदायिक नेताओं तथा वैज्ञानिकों के लिए मोबाइल एप्प का निर्माण किया जायेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण तथा जन शिक्षा कार्यक्रम के द्वारा को जलवायु परिवर्तन तथा इसके खतरों से भी अवगत करवाया जायेगा।

प्रोजेक्ट का महत्व

इस प्रोजेक्ट के द्वारा स्थानीय समुदाय को जलवायु के अनुकूल अजीविका के साधन प्राप्त होंगे तथा इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आएगी। इकोसिस्टम (उपरोक्त वर्णित कार्य) के द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 3.5 मिलियन टन की कमी आएगी। इससे पारिस्थितिकी तंत्र को भी दीर्घकाल में लाभ होगा। यह पेरिस समझौते तथा 2030 सतत विकास अजेंडे के लक्ष्यों को प्राप्त करने में काफी सहायक सिद्ध होगा।

पृष्ठभूमि

भारत के तटवर्ती क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से काफी संवेदनशील हैं। भारत की तटरेखा जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है।बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में इसका काफी असर पड़ेगा, इन क्षेत्रों में विपरीत मौसमी परिस्थितियां जैसे चक्रवात इत्यादि की प्रवृत्ति काफी बढ़ जाएगी। भारत में लगभग 6,740 वर्ग किलोमीटर का मंग्रोव क्षेत्र है। कुछ क्षेत्रों में मंग्रोव में मानवीय गतिविधियों के कारण 50% की कमी आ गयी है, जलस्तर के बढ़ जाने के कारण इसमें और कमी होने की सम्भावना है।

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