पर्यावरण एवं पारिस्थिकी करेंट अफेयर्स

पश्चिमी घाटों को शीघ्र पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाएगा

21 मई, 2020 को केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत की। इस बैठक में पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने से संबंधित चर्चा हुई।

मुख्य बिंदु

वीडियो सम्मेलन में भाग लेने वाले राज्यों में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडु और गुजरात शामिल हैं। भारत सरकार ने डॉ. कस्तूरीरंगन के तहत एक उच्च स्तरीय कार्य समूह का गठन किया। इस समिति ने राज्यों में भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान की जिन्हें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की आवश्यकता है। समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के आधार पर, केंद्र सरकार ने 2018 में क्षेत्रों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसए) के रूप में अधिसूचित करने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिस जारी किया।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र राज्य ने अधिक से अधिक गांवों को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव दिया। अपने प्रस्ताव के तहत, महाराष्ट्र ने ईएसए के तहत 2,092 गांवों को शामिल करने का अनुरोध किया है। केंद्र ने 2,133 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था।  ये गाँव पश्चिमी घाट के 37% हिस्से को कवर करते हैं।

ईएसए क्या है? (Ecologically Sensitive Area)

जब किसी क्षेत्र को ईएसए घोषित किया जाता है, तो इसका मतलब है कि वहां खनन, थर्मल प्लांट, उत्खनन, निर्माण और उद्योगों की स्थापना पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।

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चार दशकों में भारत के डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, भारत में कार्बन डाईऑक्साइड संरक्षण में चार दशकों में सबसे अधिक गिरावट आई है।

मुख्य बिंदु

इस अध्ययन में कहा गया है कि भारत में कार्बन डाइऑक्साइड के संरक्षण मार्च में 15% और अप्रैल में 30% तक कम हो गया है। अध्ययन यह भी कहता है कि तेल और गैस, कोयले की नवीनतम खपत में गिरावट आई है। पिछले वर्ष की तुलना में देश में 2019-20 में यह 30 मिलियन टन तक गिर गया है।

जीवाश्म ईंधन का उपयोग

देश में कार्बन डाइऑक्साइड प्रदूषण मुख्य रूप से बिजली और परिवहन क्षेत्र के कारण होता है। जीवाश्म ईंधन की खपत में गिरावट भी प्रदूषण में कमी का मुख्य कारण है। पहली बार मार्च में कोयले से चलने वाले बिजली उत्पादन द्वारा उत्पन्न बिजली में 15% की कमी आई है। साथ ही, मार्च में अक्षय ऊर्जा उत्पादन में 6.4% की वृद्धि हुई है।

कोयले से गैस की जाने वाली बिजली में संदेह के कारण कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भी कमी हो गई है।

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