पर्यावरण एवं पारिस्थिकी करेंट अफेयर्स

तेज़ी से पिघल रही है ग्रीनलैंड की बर्फ : अध्ययन

टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डेनमार्क (DTU) स्पेस लैब के अध्ययन का प्रकाशन अमेरिकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल अकैडमी ऑफ़ साइंसेज में किया गया है, इसमें ग्रीनलैंड की आइस शीत में होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डाला गया है, इस अध्ययन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने के कारण सागर के स्तर में वृद्धि हुई है, 2003 के मुकाबले 2013 में ग्लेशियर के पिघलने की दर में 4 गुना वृद्धि हुई है।
  • 2003 में बर्फ पिघलने की दर प्रतिवर्ष 111 क्यूबिक किलोमीटर थी, जबकि 10 वर्ष बाद यह दर 428 क्यूबिक किलोमीटर प्रतिवर्ष हो गयी है।
  • 2003 तक ग्रीनलैंड में अधिकतर बर्फ उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण पूर्व के ग्लेशियर में ही पिघलती थी। परन्तु 2003 से 2013 के बीच अधिकतर बर्फ ग्रीनलैंड के दक्षिण पश्चिम क्षेत्र में ही पिघली है,इस क्षेत्र में ज्यादा बड़े ग्लेशियर नहीं हैं।
  • तेज़ी से बर्फ के पिघलने का प्रमुख कारण बढ़ता हुआ तापमान है।

इस अध्ययन में कहा गया है कि बर्फ की पिघलने की दर सभी क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न है। 20वीं सदी में विश्व में समुद्र के जलस्तर में औसतन 20 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई, जबकि इस सदी में समुद्र के स्तर में प्रतिवर्ष 3.3 मिलीमीटर की वृद्धि हो रही है।

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दक्षिण एशियाई नाइट्रोजन हब

ब्रिटिश सरकार ने भारत तथा दक्षिण एशिया में नाइट्रोजन प्रदूषण के अध्ययन के लिए दक्षिण एशियाई नाइट्रोजन हब नामक अनुसन्धान परियोजना की घोषणा की है। इस शोध कार्य का नेतृत्व यूनाइटेड किंगडम के सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी द्वारा किया जायेगा, इसमें दक्षिण एशिया और यूनाइटेड किंगडम के 50 संगठन कार्य करेंगे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय संस्थान/संगठन निम्नलिखित हैं :

नेशनल स्कूल ऑफ़ ओशेनोग्राफी

गुरु गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मीटरोलॉजी

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय

नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी

TERI विश्वविद्यालय

इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य नाइट्रोजन प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों के प्रभावों का अध्ययन करना है, इसके तहत आठ दक्षिण एशियाई देश कृषि में नाइट्रोजन की भूमिका का अध्ययन किया जायेगा, इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका, भूटान और मालदीव भी शामिल हैं।

नाइट्रोजन प्रदूषण

अमोनिया तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी प्रदूषक गैसों का निर्माण उर्वरक, पशुधन खाद, जीवाश्म इंधन के जलने से होता है, इससे वायु प्रदूषण होता है तथा जैव विविधता नुकसान पहुँचता है। इससे नदी, सागर, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था तथा आजीविका पर भी प्रभाव पड़ता है।

अमोनिया तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे गैसों के कारण श्वसन तथा ह्रदय रोगों से पीड़ित लोगों को दिक्कत हो सकती है। नाइट्रस ऑक्साइड से ओजोन परत को भी नुकसान पहुँचता है। रासायनिक उर्वरक तथा खाद से नाइट्रेट के द्वारा नदी तथा सागर भी दूषित होते हैं। इससे इंसानों, मछलियों, कोरल तथा पौधों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है।

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