पर्यावरण एवं पारिस्थिकी करेंट अफेयर्स

जस्टिस मंजुला चेल्लुर बनी विद्युत् अपीलीय ट्रिब्यूनल की अध्यक्ष

न्यायमूर्ति मंजुला चेल्लुर ने 13 अगस्त, 2018 को विद्युत् अपीलीय ट्रिब्यूनल (ATE) के अध्यक्ष पद के रूप में शपथ ली। उन्हें तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए इस पद पर नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे बॉम्बे उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश थीं।

न्यायमूर्ति मंजुला चेल्लुर

न्यायमूर्ति मंजुला चेल्लुर का जन्म 5 दिसम्बर, 1955 को कर्नाटक में हुआ था। उन्होंने अल्लम सुनमंगलाम्मा महिला महाविद्यालय से बी.ए. किया। बाद में उन्होंने लॉ की डिग्री बेंगलुरु के रेणुकाचार्य लॉ कॉलेज से प्राप्त की। वर्ष 1977 में सर्वोच्च न्यायालय ने इंग्लैंड के वार्विक विश्वविद्यालय में उनकी फ़ेलोशिप को प्रायोजित किया था।

मंजुला चेल्लुर कलकत्ता उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायधीश थीं। उन्होंने केरल उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश के रूप में भी कार्य किया है। वे कर्नाटक उच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायधीश थीं। 2016 में उन्हें बॉम्बे उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायधीश नियुक्त किया गया था, वे बॉम्बे उच्च न्यायालय में नियुक्त की जाने वाली दूसरी महिला मुख्य न्यायधीश थीं। वे दिसम्बर 2017 में सेवानिवृत्त हुई थीं।

विद्युत् अपीलीय ट्रिब्यूनल

इस ट्रिब्यूनल की स्थापना केन्द्रीय उर्जा मंत्रालय ने अप्रैल 2004 में की थी। इसका क्षेत्राधिकार समस्त देश में है। यह ट्रिब्यूनल केन्द्रीय नियामक आयोग अथवा राज्य नियामक आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील अथवा याचिका की सुनवाई करता है। इस ट्रिब्यूनल को याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार विद्युत् अधिनियम के सेक्शन 121 में दिया गया है। इस ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष तथा तीन सदस्य होते हैं। इसकी बेंच का गठन अध्यक्ष द्वारा किया जाता है, प्रत्येक बेंच में कम से कम एक न्यायिक तथा एक तकनीकी सदस्य होता है।

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वृक्षारोपण के लिए फण्ड जारी करने के लिए केंद्र सरकार ने जारी की अधिसूचना

केन्द्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वृक्षारोपण (वनीकरण) के लिए नियमों की अधिसूचना जारी की, इसके मुताबिक राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को वृक्षारोपण के लिए लगभग 66,000 करोड़ रुपये आबंटित किये जायेंगे। दो वर्ष पूर्व प्रतिपूरक वनीकरण निधि अधिनियम, 2016 लागू किये जाने के बाद नियम तैयार किये गये हैं।

मुख्य बिंदु

उद्योग स्थापित किये जाने तथा अन्य अधोसंरचना सम्बंधित कार्य किये जाने के फलस्वरूप विभिन्न एजेंसियों द्वारा जमा करवाई गयी राशि से इस निधि को बनाया गया है। नियम बनाये जाने के पश्चात् अब जो राशी इस्तेमाल नहीं हो पायेगी उसे राष्ट्रीय प्रतिपूरक वनीकरण निधि (NCAF) में स्थानांतरित किया जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिपूरक वनीकरण निधि की स्थापना संघ लोक लेखा के अंतर्गत की गयी है। इनका निधियों का उपयोग केवा CAF एक्ट में दी गयी गतिविधियों के लिए ही किया जा सकता है।

प्रमुख नियम

नियमों के अनुसार प्रतिपूरक वनीकरण निधि की 80% राशि राज्यों द्वारा पौधरोपण, वनों में आग लगने की घटनाओं की रोकथाम, वनों में बिमारियों की रोकथाम, मृदा व आद्रता संरक्षण, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में सुधार इत्यादि कुल 13 गतिविधियों में उपयोग की जानी चाहिए। जबकि शेष 20% राशी का उपयोग वन तथा वन्यजीव संरक्षण इत्यादि 11 गतिविधियों में किया जाना चाहिए। इसमें वन विभाग द्वारा किये गए कार्य का निरीक्षण के लिए थर्ड पार्टी की व्यवस्था की गयी है।

पृष्ठभूमि

संसद द्वारा प्रतिपूरक वनीकरण निधि अधिनियम, 2016 पारित किये जाने के पश्चात् क्रियान्वयन के लिए नियम न होने के कारण इसे 2 वर्ष तक लागू नहीं किया जा सका। अतः कुल 80,716 करोड़ रुपये में से 14,418 करोड़ रुपये राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को अस्थायी तौर पर दिए गए थे। जबकि शेष राशी 66,298 करोड़ रुपये का उपयोग नहीं किया जा सका। इस जमा राशी में ओडिशा की हिस्सा सबसे अधिक 9,725 करोड़ रुपये है, इसके बाद छतीसगढ़ (7,288 करोड़ रुपये), मध्य प्रदेश (6,353 करोड़ रुपये) तथा झारखण्ड (5,193 करोड़ रुपये) का स्थान है।

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