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मल्टी-यूटिलिटी वाहन ‘नैपुण्य रथम’ का आंध्र प्रदेश सरकार ने शुभारंभ किया |

मुख्यमंत्री एन चंद्राबाबू नायडू ने एक बहु-उपयोगिता वाहन नैपुण्य रथम का आंध्र प्रदेश में शुभारंभ किया. जिसे ‘वर्ल्ड ऑन व्हील्स ‘ के रूप में भी जाना जाता है, इसका उद्देश्य राज्य के दूर-दराज के कोनों में प्रौद्योगिकी और नवीनता लाना है.

मुख्य तथ्य

राज्य के ‘स्मार्ट विलेज स्मार्ट वार्ड प्रोग्राम’ के हिस्से के रूप में, ‘नैपुण्य रथम’ डिजिटल साक्षरता और डिजिटल कौशल को सुगम बनाने और देखने की सुविधा देगा. राज्य सरकार ने इस परियोजना के लिए 300 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं.

नैपुण्य रथम के पहले चरण में हेवलेट पैकार्ड (एचपी), उद्यमिता विकास संस्थान (ईडीआईआई) और गाइड फाउंडेशन फॉर डेवलपमेंट के सहयोग से 13 जिलों और 28 स्मार्ट गांवों को कवर किया जाएगा। राज्य सरकार जल्द ही मई, 2018 तक 12 और नैपुण्य रथम को लांच कर देगी। एक भाग के रूप में, एक 20-सीटर बस जिसमे स्मार्ट टेक्नोलॉजी गैजेट के साथ-साथ एचपी क्लासरूम मैनेजर, एचपी वीडियो बुक और एचपी लाइफ जैसे ई-लर्निंग टूल्स के साथ डिजिटल सुविधाएं और सीखने वाली लैब होगीं , जो राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में यात्रा करेगी ।

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प्लास्टिक पार्क के लिए केंद्र ने दी 120 करोड़ की मंजूरी |

केंद्र सरकार ने देवघर में प्रस्तावित प्लास्टिक पार्क को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री अनंत कुमार ने नई दिल्ली में इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि देवघर जिले में करीब 120 करोड़ रुपए की लागत से एक प्लास्टिक पार्क तथा एक प्लास्टिक रिसाइकलिंग केंद्र की स्थापना के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी गई है।

मुख्य बिन्दु

-करीब 150 एकड़ क्षेत्र में प्लास्टिक पार्क बनेगा, जिससे करीब 6000 लोगों को प्रत्यक्ष तथा 30000 को परोक्ष रूप से रोजगार मिलेगा।
-इसके अलावा देवघर में साढ़े तीन करोड़ रुपए की लागत से देश के दूसरे प्लास्टिक रिसाइकलिंग केंद्र की भी स्थापना की जाएगी।
-देश का पहला ऐसा केंद्र अभी असम के गुवाहाटी में है।

3.5 करोड़ से प्लास्टिक रिसाइकलिंग केंद्र भी खोला जाएगा

एक केंद्रीय प्लास्टिक इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकी संस्थान (सीपेट) भी देवघर में खोला जाएगा। पहले देश में 23 सीपेट थे, जबकि पिछले साढ़े तीन साल में 40 केंद्र खोले गए और इसकी स्वर्ण जयंती पर 50 सीपेट खोलने का लक्ष्य रखा गया है। देश में सालाना 40 हजार प्लास्टिक इंजीनियर तैयार होते हैं। जबकि आठ लाख ऐसे इंजीनियरों की जरूरत है। एक करोड़ टन प्लास्टिक की खपत होती है, जोे वर्ष 2022 तक दोगुना होकर होने की संभावना है।
इससे संथालपरगना क्षेत्र से पलायन और विस्थापन रुकेगा तथा 20 दिनों में परियोजना के लिए जमीन एवं भवन की व्यवस्था की जाएगी ।

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