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‘नेलोपोटोड्स ग्रेटे’: 50 साल पुराने बीटल का नाम ग्रेटा थनबर्ग के नाम पर रखा गया

ब्रिटेन के लंदन में ब्रिटिश नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम के वैज्ञानिकों ने आधिकारिक तौर पर बीटल की एक छोटी प्रजाति, जिसे 50 वर्ष पहले खोजा गया था, का नाम ‘नेलोपोटोड्स ग्रेटे’ रखा है। यह नाम 16 वर्षीय स्वीडिश जलवायु कार्यकर्ता के ‘उत्कृष्ट योगदान’ के लिए रखा गया था।

‘नेलोपोटोड्स ग्रेटे’ क्या है?

यह एक आर्थ्रोपॉड है, जिसमें कोई आंख या पंख नहीं है और जहां आंखें होनी चाहिए थीं, उसके बीच एक छोटा गड्ढा है। यह 1 मिमी से कम लंबे समय के साथ बीटल, हल्के पीले और सोने की एक छोटी प्रजाति है। यह Ptiliidae परिवार से संबंधित है, जो दुनिया के कुछ सबसे छोटे बीटल का परिवार है।

बीटल को पहली बार 1965 में केन्या के नैरोबी में ब्रिटिश प्रकृतिवादी डॉ विलियम सी ब्लॉक ने खोजा था। केन्या में लिए गए नमूनों को ब्रिटिश प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय में संग्रहीत किया गया है।

ग्रेटा स्वीडन की हैं जिन्होंने ग्लोबल वार्मिंग पर विश्व में जागरूकता फैलाने में योगदान दिया है। जीव वैज्ञानिक नाम में दो नाम होते हैं, एक जीन्स और दूसरा प्रजाति के परिवार का होता है।

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चंद्रयान 2 : चन्द्रमा के बाह्यमंडल में आर्गन 40 की खोज की गयी

चंद्रयान 2 ने चन्द्रमा के बाह्यमंडल में आर्गन 40 की खोज की। आर्गन 40 आर्गन का एक आइसोटोप है। इसरो ने आर्गन 40 के चन्द्रमा के बाह्यमंडल में पहुँचने की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन किया है। यह पोटैशियम-40 के रेडियोएक्टिव विखंडन से उत्पन्न होता है।

मुख्य बिंदु

CHACE-20 (Chandra’s Atmospheric Composition Explorer 2) चंद्रयान-2 ऑर्बिटर में लगा हुआ एक पेलोड है, यह न्यूट्रल गैस स्पेक्ट्रोमीटर है। इस उपकरण ने 100 किलोमीटर की ऊंचाई से आर्गन 40 का पता लगाया है। चन्द्रमा में रात के दौरान गैस बाहयमंडल में संघनित होती है।

मिशन चंद्रयान-2

चंद्रयान-2 भारत का चंद्रमा पर दूसरा मिशन है, यह भारत का अब तक का सबसे मुश्किल मिशन है। यह 2008 में लांच किये गए मिशन चंद्रयान का उन्नत संस्करण है। चंद्रयान मिशन ने केवल चन्द्रमा की परिक्रमा की थी, परन्तु चंद्रयान-2 मिशन में चंद्रमा की सतह पर एक रोवर भी उतारा जाना था।

इस मिशन के सभी हिस्से इसरो ने स्वदेश रूप से भारत में ही बनाये हैं, इसमें ऑर्बिटर, लैंडर व रोवर शामिल है। इस मिशन में इसरो पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड रोवर को उतारने की कोशिश की। यह रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करके चन्द्रमा की सतह के घटकों का विश्लेषण करने के लिए निर्मित किया गया था।

चंद्रयान-2 को GSLV Mk III से लांच किया गया। यह इसरो का ऐसा पहला अंतर्ग्रहीय मिशन है, जिसमे इसरो ने किसी अन्य खगोलीय पिंड पर रोवर उतारने का प्रयास किया। इसरो के स्पेसक्राफ्ट (ऑर्बिटर) का वज़न 3,290 किलोग्राम है, यह स्पेसक्राफ्ट चन्द्रमा की परिक्रमा करके डाटा एकत्रित करेगा, इसका उपयोग मुख्य रूप से रिमोट सेंसिंग के लिए किया जा रहा है।

6 पहिये वाला रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करके मिट्टी व चट्टान के नमूने इकठ्ठा करने के लिए बनाया गया था, इससे चन्द्रमा की भू-पर्पटी, खनिज पदार्थ तथा हाइड्रॉक्सिल और जल-बर्फ के चिन्ह के बारे में जानकारी मिलने की सम्भावना थी।

चन्द्रमा की सतह पर सॉफ्ट-लैंडिंग करना इस मिशन का सबसे कठिन हिस्सा था, अब तक केवल अमेरिका, रूस और चीन ही यह कारनामा कर पाए हैं। इजराइल का स्पेसक्राफ्ट चन्द्रमा पर क्रेश हो गया था।

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