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चंद्रयान 2 : चन्द्रमा के बाह्यमंडल में आर्गन 40 की खोज की गयी

चंद्रयान 2 ने चन्द्रमा के बाह्यमंडल में आर्गन 40 की खोज की। आर्गन 40 आर्गन का एक आइसोटोप है। इसरो ने आर्गन 40 के चन्द्रमा के बाह्यमंडल में पहुँचने की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन किया है। यह पोटैशियम-40 के रेडियोएक्टिव विखंडन से उत्पन्न होता है।

मुख्य बिंदु

CHACE-20 (Chandra’s Atmospheric Composition Explorer 2) चंद्रयान-2 ऑर्बिटर में लगा हुआ एक पेलोड है, यह न्यूट्रल गैस स्पेक्ट्रोमीटर है। इस उपकरण ने 100 किलोमीटर की ऊंचाई से आर्गन 40 का पता लगाया है। चन्द्रमा में रात के दौरान गैस बाहयमंडल में संघनित होती है।

मिशन चंद्रयान-2

चंद्रयान-2 भारत का चंद्रमा पर दूसरा मिशन है, यह भारत का अब तक का सबसे मुश्किल मिशन है। यह 2008 में लांच किये गए मिशन चंद्रयान का उन्नत संस्करण है। चंद्रयान मिशन ने केवल चन्द्रमा की परिक्रमा की थी, परन्तु चंद्रयान-2 मिशन में चंद्रमा की सतह पर एक रोवर भी उतारा जाना था।

इस मिशन के सभी हिस्से इसरो ने स्वदेश रूप से भारत में ही बनाये हैं, इसमें ऑर्बिटर, लैंडर व रोवर शामिल है। इस मिशन में इसरो पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड रोवर को उतारने की कोशिश की। यह रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करके चन्द्रमा की सतह के घटकों का विश्लेषण करने के लिए निर्मित किया गया था।

चंद्रयान-2 को GSLV Mk III से लांच किया गया। यह इसरो का ऐसा पहला अंतर्ग्रहीय मिशन है, जिसमे इसरो ने किसी अन्य खगोलीय पिंड पर रोवर उतारने का प्रयास किया। इसरो के स्पेसक्राफ्ट (ऑर्बिटर) का वज़न 3,290 किलोग्राम है, यह स्पेसक्राफ्ट चन्द्रमा की परिक्रमा करके डाटा एकत्रित करेगा, इसका उपयोग मुख्य रूप से रिमोट सेंसिंग के लिए किया जा रहा है।

6 पहिये वाला रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करके मिट्टी व चट्टान के नमूने इकठ्ठा करने के लिए बनाया गया था, इससे चन्द्रमा की भू-पर्पटी, खनिज पदार्थ तथा हाइड्रॉक्सिल और जल-बर्फ के चिन्ह के बारे में जानकारी मिलने की सम्भावना थी।

चन्द्रमा की सतह पर सॉफ्ट-लैंडिंग करना इस मिशन का सबसे कठिन हिस्सा था, अब तक केवल अमेरिका, रूस और चीन ही यह कारनामा कर पाए हैं। इजराइल का स्पेसक्राफ्ट चन्द्रमा पर क्रेश हो गया था।

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कॉस्मिक येति क्या है?

वैज्ञानिकों ने गलती से शुरुआती ब्रह्मांड में ‘एक बड़ी आकाशगंगा में पैरों के निशान’ की खोज की है जो पहले कभी नहीं देखी गई थी, इसे कॉस्मिक येति कहा गया है।। खोज ब्रह्मांड में कुछ सबसे बड़ी आकाशगंगाओं के पहले बढ़ते कदमों में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। खगोलीय निष्कर्ष एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित किए गए थे।

कॉस्मिक येति

वैज्ञानिकों ने नवनिर्मित बड़ी आकाशगंगा को मिथकीय येति के समान माना है क्योंकि पहले वैज्ञानिक समुदाय आमतौर पर इन आकाशगंगाओं को उनके अस्तित्व के साक्ष्य की कमी को देखते हुए लोककथाओं के रूप में मानते थे, लेकिन हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में खगोलविद उसकी तस्वीर को बनाने में कामयाब रहे।

मुख्य निष्कर्ष

हाल के अध्ययन में पाया गया युवा ब्रह्मांड की कुछ सबसे बड़ी आकाशगंगाएं बहुत जल्दी परिपक्व हो जाती हैं, यह एक ऐसी चीज है जिसे अभी तक सैद्धांतिक रूप से नहीं समझा गया है।

“कॉस्मिक येति” आकाशगंगा अभी तक धूल के बादलों से छिपी हुई थी और मिल्की वे के रूप में कई सितारे थे। यह मिल्की वे की तुलना में 100 गुना अधिक तेज गति से नए सितारे बना रहा था।

प्रमुख पहेली बनी हुई है कि ये परिपक्व आकाशगंगाएं कहीं से भी निकलती दिखाई देती हैं क्योंकि खगोलशास्त्री इन्हें बनाते हुए कभी खोज नहीं पाते हैं। लेकिन अब नई खोज ब्रह्मांड के शैशव काल में अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकती है।

अनुसंधान दल ने अटाकामा लार्ज मिलीमीटर एरे (ALMA) का उपयोग करते हुए रोशनी की खोज की और अनुमान लगाया कि इस आकाशगंगा से प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में 12.5 बिलियन साल लगे हैं।

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