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मिशन गगनयान के लिए इसरो ने किये भारतीय वायुसेना के साथ समझौते पर हस्ताक्षर

इसरो और भारतीय वायुसेना ने मिशन गगनयान के लिए अंतरिक्षयात्रियों को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं। इस समझौते में बेंगलुरु में बेस्ड भारतीय वायुसेना की मेडिकल शाखा “इंस्टिट्यूट ऑफ़ एयरोस्पेस मेडिसिन” को शामिल किया गया है, यह भारत के पहले अंतरिक्षयात्रियों के प्रशिक्षण के लिए नोडल केंद्र के रूप में कार्य करेगा। गौरतलब है कि मिशन गगनयान 2022 में लांच किया जायेगा, इसके द्वारा भारतीय अंतरिक्षयात्रियों को अन्तरिक्ष में भेजा जायेगा।

मिशन गगनयान

भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने मिशन गगनयान के लिए दिसम्बर, 2021 को डेडलाइन निश्चित की है। गगनयान के लिए अन्तरिक्षयात्रियों का शुरूआती प्रशिक्षण भारत में ही किया जायेगा, बाद में एडवांस्ड प्रशिक्षण रूस में भी किया जा सकता है। हाल ही में केन्द्रीय कैबिनेट ने मिशन गगनयान के लिए 10,000 करोड़ रुपये के बजट को भी मंजूरी दी थी। इस मिशन में तीन अन्तरिक्षयात्रियों को अन्तरिक्ष में 5-7 दिनों के लिए अन्तरिक्ष में भेजा जायेगा। भारत ऐसा कारनामा करने वाला चौथा देश बनेगा

मिशन के मुख्य बिंदु

गगनयान मिशन की लागत लगभग 10,000 करोड़ रुपये आएगी। यह मिशन पूर्ण रूप से स्वदेशी होगा। इस मिशन के वास्तविक लांच से पहले इसरो बिना मानव के दो मिशन लांच करेगा, पहला मिशन 30 महीने में तथा दूसरा मिशन 36 महीने बाद लांच किया जायेगा।

चरण

गगनयान मिशन के लिए GLSV Mk-III लांच व्हीकल का उपयोग किया जायेगा। मिशन गगनयान के स्पेस क्राफ्ट में एक क्रू मोड्यूल तथा एक सर्विस मोड्यूल होगा। इसका भार लगभग 7 टन होगा। इस मिशन में तीन अन्तरिक्ष यात्रियों को 5-7 दिन के लिए अन्तरिक्ष में भेजा जायेगा। इस स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी की कक्षा में 300-400 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जायेगा। क्रू मोड्यूल का आकार 3.7 मीटर तथा सर्विस मोड्यूल का आकार 7 मीटर होगा।

परिक्रमा

इस मिशन को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट से लांच किया जायेगा। यह स्पेसक्राफ्ट 16 मिनट में अपेक्षित ऊंचाई पर पहुँच जायेगा। इस मिशन के लिए क्रू का चयन भारतीय वायुसेना व इसरो द्वारा संयुक्त रूप से किया जायेगा। बाद में इस क्रू को 2-3साल तक प्रशिक्षण दिया जायेगा।

वापसी

वापसी के लिए मोड्यूल के वेग को कम किया जाएगा और इसे विपरीत दिशा में घुमाया जायेगा। जब यह पूरा मोड्यूल पृथ्वी की सतह से 120 किलोमीटर की दूरी पर पहुंचेगा तो सर्विस मोड्यूल को अलग किया जायेगा। केवल क्रू वाला मोड्यूल ही पृथ्वी पर पहुंचेगा। इसे पृथ्वी पर पहुँचने में लगभग 36 मिनट लगेंगे। इसरो क्रू मोड्यूल को गुजरात के निकट अरब सागर अथवा गुजरात की खाड़ी में लैंड करवाने की योजना बना रहा है।

इस मिशन को भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस से लगभग 6 महीने पहले क्रियान्वित किया जायेगा।

गगनयान के लिए इसरो द्वारा विकसित तकनीक

इसरो अन्तरिक्ष में मानव भेजने के लिए महत्वपूण तकनीकों का परिक्षण कर रहा है। इस मिशन को 10,000 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया जायेगा। इसके लिए कई उपकरण तैयार किये जा चुके हैं। इसके लिए हैवी लिफ्ट लांच व्हीकल GSLV मार्क-III, रिकवरी टेक्नोलॉजी, क्रू मोड्यूल, अन्तरिक्ष यात्री प्रशिक्षण व्यवस्था, वातावरण नियंत्रण तथा लाइफ सपोर्ट सिस्टम का सफलतापूर्वक निर्माण कर लिया गया है। दिसम्बर, 2014 में GSLV मार्क-III का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया था। इसके बाद जून 2017 में GSLV मार्क-III की पहली डेवलपमेंटल उड़ान सफलतापूर्वक भरी थी। जुलाई, 2018 में क्रू एस्केप सिस्टम का परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया था। अभी भी कुछ एक टेक्नोलॉजी व उपकरणों का निर्माण किया जाना बाकी है।

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स्पेस एक्स का स्टार लिंक प्रोजेक्ट

हाल ही में अमेरिका की निजी अन्तरिक्ष एजेंसी स्पेस एक्स ने राकेट के द्वारा 60 उपग्रहों को अन्तरिक्ष में स्थापित किया गया, यह उपग्रह स्पेस एक्स की “स्टार लिंक” परियोजना का हिस्सा हैं। इन उपग्रहों को अमेरिका के फ्लोरिडा के केप कैनवेरल से फाल्कन 9 राकेट की सहायता से लांच किया गया। इस राकेट ने उपग्रहों को 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया। इन संचार उपग्रहों की सहायता से अन्तरिक्ष से इन्टरनेट की सुविधा प्रदान की जायेगी। प्रत्येक उपग्रह का भार लगभग 500 पौंड (227 किलोग्राम) है। इनका निर्माण अमेरिका के सीएटल के रेडमोंड में किया गया था।

जब स्टार लिंक समूह में 800 से अधिक उपग्रह एक्टिवेट हो जायेगा, तब यह ऑपरेशनल हो जायेगा। स्टार लिंक प्रोजेक्ट के अंतर्गत स्पेस-एक्स ने अन्तरिक्ष में 12,000 संचार उपग्रह स्थापित करने की योजना बनाई है। इसके द्वारा विश्व भर में हाई-स्पीड इन्टरनेट की सुविधा प्रदान की जायेगी।

स्पेस एक्स

स्पेस एक्स एक निजी अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी है। इसकी स्थापना एलोन मस्क द्वारा 6 मई, 2002 को की गयी थी। एलोन मस्क स्पेस एक्स के वर्तमान सीईओ हैं। इस अन्तरिक्ष एजेंसी की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य अन्तरिक्ष परिवहन की लागत कम करना तथा मंगल गृह पर मानव बस्ती की स्थापना करना है। स्पेस एक्स ने फाल्कन रॉकेट्स की श्रृंखला तैयार की है। अंतिरक्ष परिवहन की लागत को कम करने के लिए स्पेस एक्स ने री-यूजेबल रॉकेट्स (पुनः इस्तेमाल किये जा सकने वाले राकेट) निर्मित किये हैं। इन रॉकेट्स के अधिकत्तर हिस्सों को अन्य लांच में भी इस्तेमाल किया जाता है।

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