करेंट अफेयर्स- अक्तूबर, 2019

DRDO ने भारत की अगली पीढ़ी की हाइपरसोनिक मिसाइल का निर्माण शुरू किया

रक्षा अनुसन्धान व विकास संगठन (DRDO) ने भारत की अगली पीढ़ी की हाइपरसोनिक मिसाइलों का निर्माण शुरू कर दिया है। हाइपरसोनिक मिसाइलों आवाज़ की गति से पांच गुणा तेज़ गति से यात्रा करती हैं। इसके लिए DRDO ‘विंड टनल’ में तकनीक का परीक्षण करेगा।

महत्व

विश्व में हाइपरसोनिक हथियारों की टेक्नोलॉजी के लिए प्रतिस्पर्धा जारी है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश लगातार अपनी टेक्नोलॉजी का परीक्षण कर रहे हैं। चीन अपने पास हाइपरसोनिक हथियार होने का प्रदर्शन कर चुका है जबकि अमेरिका और रूस इस पर अभी चुप हैं।

हाइपरसोनिक हथियार

हाइपरसोनिक हथियार अत्याधिक तीव्र गति से पारंपरिक तथा परमाणु पेलोड ले जाने में सक्षम होते हैं। इस तकनीक की सहायता से आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली से बचा जा सकता है। हालांकि बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम भी तीव्र गति से हथियारों को लक्ष्य पर गिरा सकते हैं, परन्तु हाइपरसोनिक वाहनों को ट्रैक व इंटरसेप्ट करना बहुत मुश्किल होता है।

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भारत के सबसे ऊँचे पुल का उद्घाटन किया गया

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लद्दाख में कर्नल चेवांग रिनचेन सेतु का उद्घाटन किया। इस पुल का नाम कर्नल चेवांग रिनचेन के नाम पर रखा गया है, कर्नल रिनचेन लद्दाख से भारतीय सेना के अफसर थे। उन्हें 1952 में महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

कर्नल चेवांग रिनचेन सेतु

  • इस पुल का निर्माण लद्दाख क्षेत्र में 14,650 फीट की ऊंचाई पर किया गया है।
  • इस पुल का निर्माण सामरिक रूप से महत्वपूर्ण दुरबुक श्योक दौलत बेग ओल्डी सड़क पर किया गया है।
  • यह चीन के साथ लगने वाली लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल से 45 किलोमीटर पूर्व में स्थित है।
  • इस पुल की चौड़ाई 4.5 मीटर है, यह पुल 70 टन श्रेणी के वाहनों का भार उठाने में सक्षम है।
  • इससे श्योक नदी के दूसरी ओर के क्षेत्र में विकास को गति मिलेगी तथा यात्रा के समय में भी कमी आएगी।
  • इस पुल का निर्माण सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा किया गया है।
  • इस पुल का निर्माण 15 महीने में किया गया, इसमें 6900 क्यूबिक मीटर कंक्रीट तथा 1984 मीट्रिक टन स्टील का उपयोग किया गया।

कर्नल चेवांग रिनचेन

कर्नल चेवांग रिनचेन को ‘लद्दाख का शेर’ भी कहा जाता है, उन्हें दो बार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 1948 में पाकिस्तानी कबाइलियों द्वारा कारगिल पर कब्ज़ा किये जाने के बाद वे लेह पर कब्ज़ा करने की फिराक में थे। इस क्षेत्र से संख्या लेफ्टिनेंट कर्नल पृथी  सिंह द्वारा की गयी थी, उनके पास केवल 33 सैनिक थे। उस समय कर्नल पृथी सिंह ने सहायता मांगी, 17 वर्षीय रिनचेन उनकी सहायता करने वाले प्रथम व्यक्ति थे। रिनचेन ने अपने 28 मित्रों को भर्ती करके ‘लद्दाख स्काउट्स’ का गठन किया और युद्ध में विजय हासिल की। उनकी इस वीरता के लिए उन्हें 1952 में महावीर चक्र से सम्मानित किया था।

1971 में लद्दाख के प्रतापपुर सेक्टर में दुश्मन के नौ ठिकानों को मुक्त करने के लिए उन्हें पुनः महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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