करेंट अफेयर्स एवं हिन्दी समाचार सारांश

उर्जा मंत्रालय ने लांच किया चिलर स्टार लेबलिंग प्रोग्राम

केन्द्रीय उर्जा मंत्रालय ने हाल ही में चिलर स्टार लेबलिंग प्रोग्राम लांच किया, इसका उद्देश्य देश में चिलर सिस्टम में उर्जा दक्षता को बढ़ावा देना है। इसे 24वें विश्व ओजोन दिवस के उपलक्ष्य तथा मोंट्रियल प्रोटोकॉल (16 सितम्बर) की 31वीं वर्षगाँठ पर लांच किया गया।

चिलर स्टार लेबलिंग प्रोग्राम

इस प्रोग्राम का निर्माण उर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा किया गया है। इस प्रोग्राम में उर्जा दक्षता के मामले में स्टार रेटिंग प्रदान की जाएगी। आरम्भ में इस प्रोग्राम को स्वैच्छिक आधार पर लांच किया गया है, यह प्रोग्राम 31 दिसम्बर, 2020 तक वैध होगा। इस प्रोग्राम के तहत शीघ्र स्वीकृति के लिए BEE ने ऑनलाइन पंजीकरण प्लेटफार्म लांच किया है। इस प्लेटफार्म के द्वारा चिलर (chiller) निर्माता कंपनियां अपने चिलर उपकरण की उपयुक्त स्टार रेटिंग के लिए पंजीकरण कर सकते हैं। नामित एजेंसियों तथा BEE के द्वारा प्रमाणीकरण किये जाने के बाद चिलर को 1 से 5 के बीच की रेटिंग दी जाएगी।

चिलर के लिए स्टार लेबलिंग का महत्व

इससे केन्द्रीय HVAC (heat, ventilation and air conditioning) की उन्नत टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना में सहायता मिलेगी और बड़े वाणिज्यिक व औद्योगिक अनुप्रोयोगों के लिए उर्जा दक्षता समाधानों को भी सुविधाजनक बनाया  जा सकेगा। इससे 2019 में 500 मिलियन यूनिट बिजली की बचत की जा सकेगी। इससे 0.5 मिलियन टन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी होगी। 2030 तक इस प्रोग्राम के द्वारा 4 अरब यूनिट विद्युत की बचत तथा 3.5 टन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की कमी की जा सकेगी।

पृष्ठभूमि

चिलर का उपयोग भवनों की स्पेस कंडीशनिंग तथा औद्योगिक कूलिंग प्रक्रिया के लिए किया जाता है। भारत में 2017 में चिलर बाज़ार का आकर 1 मिलियन टन प्रतिवर्ष था। CAGR के अनुसार रिटेल, पर्यटन, अधोसंरचना परियोजनाओं में वृद्धि होने के कारण इसमें 3.6 की वृद्धि होने की उम्मीद है। चिलर के संचालन के लिए काफी अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है, चिलर किसी वाणिज्यिक भवन की लगभग 40% उर्जा का उपयोग करते हैं। इसलिए चिलर के मामले में उर्जा दक्षता को बढ़ावा देना बहुत ज़रूरी है,  इससे उर्जा खपत में कमी आएगी।

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भारत में असामान्य मानसून का कारण वायु प्रदूषण : अध्ययन

हाल ही में IIT कानपूर के वैज्ञानिकों द्वारा किये गए शोध में सामने आया है कि भारत में असामान्य मानसून का एक प्रमुख कारण वायु प्रदूषण है। इस अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि वायु प्रदूषण के उच्च स्तर के कारण बादलों के आकार, सरंचना तथा गहराई में भी परिवर्तन हो रहा है।

मुख्य बिंदु

इस अध्ययन के अनुसार अत्याधिक एरोसोल, निलंबित ठोस कण जैसे धूल, धुआं इत्यादि के कारण बादलों के आकार, सरंचना, आकार तथा तापमान में परिवर्तन आ रहा है, इससे भारतीय उप-महाद्वीप में वर्षा के पैटर्न में काफी परिवर्तन आ रहा है।

बादलों के निर्माण के लिए एरोसोल बहुत आवश्यक हैं, बिना एरोसोल के बादलों का निर्माण नही हो सकता, इसकी अनुपस्थिति में वर्षा भी नहीं होती। लघु काल में बादलों की सरंचना व आकार से वर्षा के पैटर्न में आकस्मिक परिवर्तन आ रहा है। परन्तु वायु प्रदूषण के कारण दीर्घकाल में मानसून के दौरान वर्षा में कमी भी आ सकती है।

अध्ययन का महत्व

वायु प्रदूषण और वर्षा के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध की पुष्टि पहले भी कई अध्ययनों द्वारा की जा चुकी है। इस अध्ययन में एरोसोल के कारण बादलों में होने वाले परिवर्तन का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस अध्ययन से दिन और रात के तापमान में अंतर कम होने के बारे में भी पता चला है। इस अध्ययन के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने सैटेलाइट डाटा और वातावरण कंप्यूटर मॉडल से पिछले 16 वर्षों के डाटा का अवलोकन किया।

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