अरुणाचल प्रदेश

संस्कृति मंत्रालय ने गुजरात में माधवपुर मेला का आयोजन किया

गुजरात के प्रसिद्ध माधवपुर मेले का उत्तर-पूर्व के राज्यों के साथ एक अनोखी पहल के अंतर्गत पहला सांस्कृतिक एकीकरण दिखाई देगा। इसका उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों, प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों को एक भारत-श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम के तहत एक-दूसरे के निकट लाना है।
• अरुणाचल प्रदेश की मिश्मी जनजाति से यह मेला संबद्ध है। मिश्मी जनजाति, प्राचीन राजा भीष्मक और उनकी पुत्री रुक्मिणी के ज़रिये भगवान कृष्ण को अपना पूर्वज मानती है।
• इस मेले में भगवान कृष्ण के साथ रुक्मिणी देवी की अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक की अमर यात्रा का उल्लास पहली बार मनाया जाएगा।
• उत्तर-पूर्व से 150 लोगों के एक जत्थे का माधवपुर मेले में रुक्मिणी के परिवार के प्रतिनिधि के तौर पर पारंपरिक स्वागत किया जाएगा।
• कल्कि पुराण में निचले दिबांग घाटी शहर में रोइंग के निकट स्थित भीष्मकनगर का जिक्र भी मिलता है।
• संस्कृति मंत्रालय के तहत, राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), मानव संग्रहालय और गुजरात, असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर राज्य एवं अन्य संस्थाएँ, इस मेले को एक नया आयाम देने के लिये एक साथ काम कर रही हैं।
• पश्चिम बंगाल को छोड़कर इस अभियान में शेष सभी राज्य एवं संघीय क्षेत्र भाग ले रहे हैं।
• एक भारत-श्रेष्ठ भारत अभियान इस वर्ष के उत्सव का मूल उद्देश्य के अनुरूप है और विविधता में एकता की देश की विशिष्टता को दर्शाने के साथ-साथ पश्चिम एवं पूर्व के बीच संबंध स्थापित करना है।
• सांस्कृतिक एकीकरण के उद्देश्य से दोनों क्षेत्रों के आयोजित किये गए चार दिन के इस पर्व में अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर एवं उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों की कला, नृत्य, संगीत, कविता, कथा वाचन और लोक-नाटकों का जीवंत प्रदर्शन किया जाएगा।

पृष्ठभूमि

सांस्कृतिक रूप से महत्त्वपूर्ण माधवपुर घेड एक छोटा गाँव है,जहाँ भगवान कृष्ण ने राजा भीष्मक की बेटी रुक्मिणी से लोककथाओं के अनुसार विवाह किया था। माधवपुर पोरबंदर के निकट, समुद्र तट पर स्थित है। 15वीं शताब्दी में निर्मित इस माधवराय मंदिर स्थल को प्रतिबिंबित करता है। एक सांस्कृतिक मेले द्वारा इस समारोह का आगाज़ किया जाता है, जो रामनवमी से शुरू होता है। एक रंगीन रथ कृष्ण की मूर्ति को लेकर गाँव की परिक्रमा करता है और आमतौर पर यह उत्सव पाँच दिनों तक चलता है।

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