ओजोन

संयुक्त राष्ट्र: दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर 70% तक गिर गया

28 जुलाई, 2020 को, संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि नई दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर लॉक डाउन के दौरान 70% से अधिक गिर गया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय संगठन के अनुसार, यह शहरों के दोबारा खुलने तक अस्थायी हो सकता है।

मुख्य बिंदु

अन्य देशों में भी नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर नीचे गिर गया है। चीन में यह स्तर 40% तक गिर गया है, बेल्जियम में 20%,  संयुक्त राज्य अमेरिका में 19-40% के बीच गिरावट दर्ज की गयी है।

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड हानिकारक क्यों है?

नाइट्रोजन ऑक्साइड हवा की गुणवत्ता को कम करता है। यह पार्टिकुलेट मैटर के माध्यम से अमोनिया के साथ मिल कर ओजोन परत (स्ट्रैटोस्फेरिक ओजोन) को नुकसान पहुंचाता है। यह कैंसर और अन्य सांस की बीमारियों जैसे मानव स्वास्थ्य जोखिमों को भी बढ़ाता है। नाइट्रोजन ऑक्साइड नाइट्रिक एसिड में परिवर्तित हो सकते हैं और एसिड वर्षा का कारण बन सकते हैं। अम्लीय वर्षा अत्यधिक हानिकारक होती है क्योंकि वह ज़मीन में रिस कर भूमिगत जल को दूषित कर देती है।

जमीनी स्तर पर ओजोन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड

कुल ओजोन का लगभग 90% स्ट्रैटोस्फियर में मौजूद है। 10% क्षोभमंडल में पाया जाता है और स्ट्रैटोस्फेरिक ओजोन की तुलना में कम केंद्रित होता है। ज़मीनी स्तर पर ओजोन कार्बनिक यौगिकों और नाइट्रोजन ऑक्साइड के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया द्वारा बनाया जाता है। चूंकि ओजोन एक ग्रीनहाउस गैस है, यह ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती है। इस प्रकार, वायुमंडल में नाइट्रोजन ऑक्साइड को नियंत्रित करना आवश्यक है।

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ओजोन छिद्र का सबसे छोटा आकार दर्ज किया गया

नासा के अनुसार हाल ही में दक्षिणी ध्रुव में ओजोन छिद्र के सबसे छोटे आकर को दर्ज किया गया है। वर्ष 2006 में जब ओजोन छिद्र की खोज हुई थी, तब इसका आकार 10.3 मिलियन वर्ग मील था। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक अब इस ओजोन छिद्र का आकर 3.6 मिलियन वर्ग मील दर्ज किया गया है। प्रतिवर्ष सितम्बर व अक्टूबर में ओजोन छिद्र अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचता है तथा दिसम्बर के अंत तक गायब हो जाता है।

ओजोन परत

ओजोन परत गैस की एक सुरक्षा परत है, यह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। इस परत में ओजोन (O3) की काफी अधिक मात्रा पायी जाती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन, हेलॉन तथा कार्बनटेट्राक्लोराइड जैसे तत्त्व ओजोन परत के लिए काफी नुकसानदायक होते हैं।

मोंट्रियल प्रोटोकॉल

यह एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, इसे ओजोन परत के संरक्षण के लिए बनाया गया था। इस संधि पर 26 अगस्त, 1987 को कनाडा के मोंट्रियल में सहमती प्रकट की गयी थी, यह संधि 26 अगस्त, 1989 से लागू हुई थी। इस संधि के बाद मई, 1989 में हेलसिंकी में एक बैठक का आयोजन किया गया था। इस बैठक में क्लोरोफ्लोरोकार्बन, CTC हेलॉन, मिथाइल ब्रोमाइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म तथा कार्बनटेट्राक्लोराइड को कम करने पर चर्चा की गयी थे। इस प्रस्ताव के विश्व भर के 197 देशों द्वारा पारित किया गया था। यह संधि काफी सफल भी रही है।

ओजोन परत संरक्षण के लिए विएना सम्मेलन

यह एक बहुराष्ट्रीय समझौता है, इस पर 1985 में सहमती प्रकट की गयी थी और यह 1988 में लागू हुआ था। इस 197 सदस्य देशों द्वारा पारित किया गया है। यह ओजोन परत की संरक्षण के लिए एक फ्रेमवर्क के रूप में कार्य करता है। परन्तु इस समझौते में ओजोन परत को नष्ट करने वाले कारकों को कम करने के सम्बन्ध में कोई व्यवस्था नहीं की गयी है।

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