कार्बन डाइऑक्साइड

भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जक: रिपोर्ट

हाल ही में ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा किये गये अध्ययन के अनुसार भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा कार्बन डाइऑक्साइड उत्पादक देश है, वर्ष 2017 में भारत ने विश्व का कुल 7% कार्बन  डाइऑक्साइड उत्सर्जन किया। 2018 में भारत के कार्बन उत्सर्जन में 6.3% की वृद्धि हुई, इसमें कोयला (7.1%), तेल (2.9%) तथा गैस (6%) प्रमुख है।

मुख्य बिंदु

विश्व के दस सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जन देश हैं : चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ, भारत, रूस, जापान, जर्मनी, ईरान, सऊदी अरब तथा दक्षिण कोरिया। इस अध्ययन में यह सामने आया है कि भारत और चीन अभी भी काफी हद तक कोयले पर निर्भर हैं, जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ धीरे-धीरे कम कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं।

भारत कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के लिए सौर उर्जा पर निरंतर कार्य कर रहा है, कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय सोलर संगठन में अपनी सशक्त भूमिका निभानी होगी। इस अध्ययन रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन 2018 के अवसर पर जारी किया गया। इस रिपोर्ट में 2018 में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में वृद्धि होने का अंदेशा जताया गया है, इसका मुख्य कारण तेल तथा गैस के उपयोग में वृद्धि है।

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कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते स्तर के कारण मछलियाँ खो रहीं हैं अपनी सूंघने की शक्ति : अध्ययन

हाल ही में किये गए एक अध्ययन के अनुसार कार्बन उत्सर्जन के बढ़ने के कारण मछलियों की सूंघने की शक्ति कम होती जा रही है। कार्बन डाइऑक्साइड के कारण जल अम्लीय हो रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड के समुद्री जल में घुल जाने के कारण कार्बनिक एसिड का निर्माण होता है। इससे कई सागरों के अमलीकरण के कारण मछलियों की सूंघने की शक्ति ख़त्म होने की सम्भावना है, इससे उनके जीवन के लिए संकट उत्पन्न हो जायेगा।

पृष्ठभूमि

मछलियाँ अपनी सूंघने की शक्ति का उपयोग भोजन ढूँढने, एक दूसरे को पहचानने और खतरों का पता लगाने के लिए करती हैं। 1880 के दशक से लेकर आज तक महासागरों में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में 43% की वृद्धि हुई है। इस शताब्दी के अंत तक इस स्तर के दुगना होने की सम्भावना है।

मुख्य बिंदु

इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने एक युवा सी बेस मछली के व्यवहार का अध्ययन वर्तमान महासागरीय परिस्थितियों में किया। इस अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि अम्लीय जल में सी बेस मछली कम तैरती है और परभक्षी के खतरे को काफी देर से भांपती है। इस प्रोजेक्ट में केवल सी बेस मछली पर ही अध्ययन किया गया, परन्तु इसकी सूंघने की शक्ति अन्य मछलियों की तरह ही है, अतः इस अध्ययन के परिणाम अन्य मछलियों पर भी लागू होंगे।

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