जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़

सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले के निर्णय पर दायर सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किया

सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले के निर्णय पर दायर करेगा पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है। यह निर्णय मुख्य न्यायधीश एस.ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने किया, इसमें जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, अशोक भूषण, एस.ए. नज़ीर और संजीव खन्ना शामिल थे। इस बेंच ने सभी 18 पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने 5 एकड़ की विवादित भूमि पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। न्यायालय ने केंद्र सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के निर्माण के लिए किसी अन्य स्थान पर पांच एकड़ भूमि प्रदान करने का आदेश दिया है।

यह निर्णय भारत के मुख्य न्यायधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों वाली पीठ ने सुनाया। इस पीठ में जस्टिस अशोक भूषण, एस.ए. बोबड़े, डी. वाई. चंद्रचूड़ तथा एस. अब्दुल नजीर शामिल है। इस फैसले का समर्थन पाँचों न्यायधीशों ने किया है।

अयोध्या भूमि विवाद की टाइमलाइन

1885 : महंत रघुबर दास ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए प्रथम मुकद्दमा दायर किया।

1949 : बाबरी मस्जिद के अन्दर भगवान् श्री राम की मूर्तियाँ पायी गयीं।

1950 से 1950 के बीच हिन्दू तथा मुस्लिम संगठनों ने 5 अन्य मुकद्दमे दायर किये।

1992 : दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को नष्ट किया।

2010 : इलाहबाद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन पार्टियों – निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा राम लल्ला में विभाजित किया था।

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भारत के मुख्य न्यायधीश का कार्यालय RTI के दायरे में आता है : सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 नवम्बर, 2019 को स्पष्ट किया कि भारत के मुख्य न्यायधीश का कार्यालय भी सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के दायरे में आता है। इस पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई द्वारा की गयी, इस पीठ में जस्टिस एन.वी. रमण, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता तथा जस्टिस संजीव खन्ना शामिल थे।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005

संसद ने 15 जून, 2005 को इस बिल को पारित किया था, यह अधिनियम 12 अक्टूबर, 2005 को लागू हुआ था। इस अधिनियम के तहत सरकारी विभागों को नागरिकों द्वारा मांगी गयी सूचना का जवाब निश्चित समय के भीतर देना पड़ता है। इसका पालन न करने पर सरकारी अधिकारियों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। RTI अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता का बढ़ावा देना व सरकारी विभागों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इस अधिनियम के तहत RTI आवेदन पत्र को जवाब सरकारी विभाग को 30 दिन के भीतर देना होता है।

नोट

RTI के तहत आतंरिक सुरक्षा से सम्बंधित जानकारी, बौद्धिक संपदा इत्यादि जानकारी नहीं दी जा सकती। निर्णय लागू किये जाने तक कैबिनेट पेपर्स को भी RTI के दायरे से बाहर रखा गया है। कैबिनेट द्वारा किये गए विचार-विमर्श इत्यादि को भी RTI के दायरे से बाहर रखा गया है।

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