पंचायती राज

राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस : 24 अप्रैल

राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल को मनाया जाता है। राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस संविधान के अधिनियम -1992 (73वां संशोधन) को पारित करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन गाँव, तहसील एवं जिला स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था का निर्माण किया गया था। राष्ट्रीय पंचायती दिवस पर देश के सबसे बेहतर ग्राम पंचायतों को पंचायती राज मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय गौरव ग्राम सभा पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।

रोचक तथ्य : सर्वप्रथम राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्टूबर, 1959 को पंचायती राज व्यवस्था अपनाई गयी थी।

पृष्ठभूमि

72वें संवैधानिक संशोधन द्वारा भारतीय संविधान में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये। 72वां संशोधन विधेयक 10 सितम्बर, 1991 को जी. वेंकट स्वामी द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक को 22 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा में पारित किया गया, जबकि राज्य सभा में इस बिल को 23 दिसम्बर, 1992 को पारित किया गया। 17 राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित किये जाने के बाद 73वां संवैधानिक संशोधन 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इस प्रकार 24 अप्रैल भारत के पंचायती राज के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। 73वें संशोधन के द्वारा संविधान में भाग-9 जोड़ा गया, इसके तहत अनुच्छेद 243 से 243 (O) में पंचायतों की व्यवस्था की गयी है, इसके द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गयी, इसमें पंचायत के 29 विषयों को शामिल किया गया है।

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राजस्थान विधानसभा ने स्थानीय निकाय चुनावों में शैक्षणिक योग्यता की शर्त को समाप्त करने के लिए बिल पारित किया

राजस्थान विधानसभा ने स्थानीय निकाय चुनावों में शैक्षणिक योग्यता की शर्त को समाप्त करने के लिए राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) बिल, 2019 तथा राजस्थान नगरपालिका (संशोधन) बिल, 2019 पारित किया।

मुख्य बिंदु

राजस्थान पंचायती राज संशोधन बिल 2015 के अनुसार उम्मीदवार की योग्यताएं निम्नलिखित होनी चाहिए :

  • म्युनिसिपल चुनाव लड़ने के लिए 10 पास होना आवश्यक है, जबकि पंचायत चुनाव में सरपंच के चुनाव के लिए आठवीं पास होना ज़रूरी है, जिला परिषद् अथवा पंचायत समिति के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास थी।
  • राज्य में पंचायती राज के चुनाव लड़ने के लिए उमीदवाद के घर में शौचालय का होना आवश्यक है।

चुनाव में शैक्षणिक योग्यता पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

हरियाणा ने पंचायती राज चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निश्चित की थी, इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार के इस निर्णय की संवैधानिक वैधता को बनाये रखा और कहा कि “सही गलत  में विभेद करने के लिए शिक्षा अति महत्वपूर्ण है” ।

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