भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍थान

आईआरएनएसएस-1 आई सेटेलाइट को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा प्रक्षेपित किया गया

पीएसएलवी-सी 41 (PSLV-C41) के माध्यम से श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के पहले लॉन्च पैड से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा आईआरएनएसएस-1 आई सेटेलाइट को 12 अप्रैल को प्रक्षेपित किया गया । यह PSLV-XL संस्करण की 20वीं उड़ान है यह सेटेलाइट पोज़ीशन, नेविगेशन और समय के सटीक निर्धारण के लिये संकेत संचारित करेगा। यह प्रक्षेपण इसरो की संचार सेटेलाइट जीएसएटी 6A के प्रक्षेपण के दो हफ्ते बाद किया जा रहा है, इससे प्रक्षेपण के दो दिनों बाद ही संपर्क टूट गया था।

मुख्य तथ्य

o यह सेटेलाइट न केवल भूमि के नेविगेशन में बल्कि समुद्री और हवाई नेविगेशन में भी मददगार हैं।
o उपग्रहों से प्राप्त डेटा को वाहन चालकों को दृश्य और वोइस नेविगेशन सहायता देने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है।
o यह सेटेलाइट आपदा प्रबंधन के साथ-साथ उचित समय प्रबंधन में भी मददगार साबित होते हैं।
o इसका वज़न 321 टन है। पीएसएलवी-सी 41 आईआरएनएसएस -1 आई को प्रक्षेपण के बाद 19 मिनट:19 सेकेंड में कक्षा में स्थापित कर देगा।
o यह आईआरएनएसएस सेटेलाइट समूह की 9वी सेटेलाइट है।
o सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में इसे स्थापित किया जाएगा। इसका सबसे नज़दीकी बिंदु पृथ्वी के ऊपर 284 किमी. पर होगा, जबकि सबसे दूरतम बिंदु पृथ्वी के ऊपर 20,650 किमी. पर होगा।
o अन्य सभी आईआरएनएसएस उपग्रहों की तरह, आईआरएनएसएस -1 आई में भी दो पेलोड ,एक नेविगेशन पेलोड (navigation payload) और दूसरा, रैंगिंग पेलोड (ranging payload) होंगे।
o स्थिति, गति तथा समय के निर्धारण के लिये नेविगेशन पेलोड का इस्तेमाल किया जाएगा, जबकि रैंगिंग पेलोड का इस्तेमाल सेटेलाइट की आवृत्ति रेंज का निर्धारण करने के लिये किया जाएगा।

आईआरएनएसएस

इसका पूरा नाम भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम है। यह उपग्रहों अर्थात् सेटेलाइट का एक सेट है जो एक साथ भारत को जीपीएस के समान एक क्षेत्रीय स्थिति वाला सिस्टम प्रदान कर सकता है। यह प्रणाली उपयोगकर्त्ताओं के प्राथमिक कवरेज क्षेत्र में 20 मीटर से अधिक तक की सटीक स्थिति हेतु डिज़ाइन की गई है। यह भारत की सीमा के करीब 1500 किमी. के घेरे में भी अपनी सेवाएँ प्रदान कर सकता है।

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जीसैट-6-ए उपग्रह के साथ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का संपर्क टूटा

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने कहा है कि जीसैट-6-ए उपग्रह के साथ उसका संपर्क टूट गया है। संगठन ने कहा है कि उपग्रह के साथ दोबारा संपर्क स्‍थापित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। जीसैट-6A का सफल परीक्षण किया गया था. यह कम्युनिकेशन सैटेलाइट बहुत दूरस्थ क्षेत्रों में भी मोबाइल कम्युनिकेशन में मदद करेगा ।

क्या है स्थिति

-उपग्रह की स्थिति पर अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि जीसैट – 6 ए को उसकी कक्षा में ऊपर उठाने का दूसरा अभियान शनिवार को सफलतापूर्वक पूरा किया गया था लेकिन 1 अप्रैल को होने वाले तीसरे और आखिरी चरण में उपग्रह से संपर्क टूट गया। किसी उपग्रह को तीन चरणों में उसकी कक्षा में स्थापित किया जाता है। 2,140 किलोग्राम वजन के जीसैट- 6ए को जीएसएलवी-एफ 08 रॉकेट से प्रक्षेपित किया गया था।
-रॉकेट के तीसरे चरण में एक क्रायोजोनिक इंजन लगा हुआ था। इसरो उपग्रह को उसकी कक्षा में स्थापित करने के अभियान के बारे में अपनी वेबसाइट पर सामान्य तौर पर जानकारी देता है। लेकिन इसने आखिरी अपडेट 30 मार्च को दिया था। रिपोर्टों से पता चलता है कि यह गड़बड़ी उपग्रह की ऊर्जा प्रणाली से जुड़ी है। उपग्रह के साथ संपर्क स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।
-जीसैट-6 की तरह ही जीसैट-6ए उच्च क्षमता वाला एस-बैंड संचार उपग्रह है। इस अंतरिक्षयान के अभियान की मियाद तकरीबन 10 साल है। यह उपग्रह मोबाइल सिग्नल को सुदूर इलाकों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है। जीसैट 6ए प्रक्षेपण से पहले ही सुर्खियों में था लेकिन इससे कुछ विवाद भी जुड़े थे। जीसैट 6 के साथ-साथ इस उपग्रह का जिक्र विवादास्पद एंट्रिक्स-देवास करार में था।
-पहले की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 30 करोड़ डॉलर के इस करार के तहत संचार उपग्रह के एस-बैंड की ज्यादातर तरंगों की पेशकश कथित तौर पर देवास को की गई थी जिसके लिए जीसैट 6 और जीसैट 6 ए में करीब 90 फीसदी ट्रांसपोंडर्स को पट्टïे पर देने के लिए सहमति बनी थी।

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