मोंट्रियल प्रोटोकॉल

यूएनईपी और आईईए रिपोर्ट: दुनिया को 2050 तक कम से कम 14 बिलियन शीतलन उपकरणों की आवश्यकता होगी

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने “शीतलन उत्सर्जन और नीति संश्लेषण” पर एक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में शीतलन दक्षता और किगाली संशोधन रिपोर्ट के लाभों का हवाला दिया गया है।

मुख्य बिंदु

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक, दुनिया को कम से कम 14 बिलियन के शीतलन उपकरण की आवश्यकता होगी। वर्तमान में, विश्व स्तर पर उपयोग में 3.6 बिलियन उपकरण हैं। यह तापमान में वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

वृद्धि के कारण

शीतलन उपकरण में वृद्धि निम्न क्षेत्रों की मांग के कारण आएगी :

  • तापमान नियंत्रित आपूर्ति श्रृंखला
  • खाद्य सुरक्षा
  • घरेलू क्षेत्र में आराम और विलासिता
  • टीकों और दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला
  • उत्पादकता

चिंताएं

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एयर कंडीशनर हाइड्रोफ्लोरोकार्बन का उपयोग करते हैं जो ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं। सही नीतिगत हस्तक्षेप के बिना, एयर कंडीशनिंग और प्रशीतन से उत्सर्जन में  2050 में 2017 के स्तर की तुलना में 90% तक बढ़ोतरी हो सकती है।

उपाय

ऊर्जा कुशल एयर कंडीशनर 1,300 GW तक ऊर्जा की आवश्यकता को कम करने में मदद कर सकते हैं। यह वर्ष 2018 में भारत और चीन में उत्पन्न संपूर्ण कोयला आधारित बिजली के बराबर है।

किगाली समझौता

यह मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन है। इस पर 2016 में किगाली में हस्ताक्षर किये गए थे। हाइड्रोफ्लोरोकार्बन को बाहर करने के लिए 1985 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए थे। जुलाई 2020 तक, 99 सदस्यों और यूरोपीय संघ ने समझौते की पुष्टि की है।

भारत

रिपोर्ट में की गई सिफारिशें दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के समान हैं।

ऊर्जा  मंत्रालय के अनुसार:

  • 2010 के बाद से भारत में एयर कंडीशनर का उत्पादन 13% बढ़ा है
  • 2017 और 2027 के बीच एयर कंडीशनर की मांग में 15% प्रति वर्ष की वृद्धि होने की उम्मीद है
  • भारत सरकार ने 24 ° C को AC के लिए डिफ़ॉल्ट तापमान के रूप में अनिवार्य किया है

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ओजोन छिद्र का सबसे छोटा आकार दर्ज किया गया

नासा के अनुसार हाल ही में दक्षिणी ध्रुव में ओजोन छिद्र के सबसे छोटे आकर को दर्ज किया गया है। वर्ष 2006 में जब ओजोन छिद्र की खोज हुई थी, तब इसका आकार 10.3 मिलियन वर्ग मील था। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक अब इस ओजोन छिद्र का आकर 3.6 मिलियन वर्ग मील दर्ज किया गया है। प्रतिवर्ष सितम्बर व अक्टूबर में ओजोन छिद्र अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचता है तथा दिसम्बर के अंत तक गायब हो जाता है।

ओजोन परत

ओजोन परत गैस की एक सुरक्षा परत है, यह पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। इस परत में ओजोन (O3) की काफी अधिक मात्रा पायी जाती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन, हेलॉन तथा कार्बनटेट्राक्लोराइड जैसे तत्त्व ओजोन परत के लिए काफी नुकसानदायक होते हैं।

मोंट्रियल प्रोटोकॉल

यह एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, इसे ओजोन परत के संरक्षण के लिए बनाया गया था। इस संधि पर 26 अगस्त, 1987 को कनाडा के मोंट्रियल में सहमती प्रकट की गयी थी, यह संधि 26 अगस्त, 1989 से लागू हुई थी। इस संधि के बाद मई, 1989 में हेलसिंकी में एक बैठक का आयोजन किया गया था। इस बैठक में क्लोरोफ्लोरोकार्बन, CTC हेलॉन, मिथाइल ब्रोमाइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म तथा कार्बनटेट्राक्लोराइड को कम करने पर चर्चा की गयी थे। इस प्रस्ताव के विश्व भर के 197 देशों द्वारा पारित किया गया था। यह संधि काफी सफल भी रही है।

ओजोन परत संरक्षण के लिए विएना सम्मेलन

यह एक बहुराष्ट्रीय समझौता है, इस पर 1985 में सहमती प्रकट की गयी थी और यह 1988 में लागू हुआ था। इस 197 सदस्य देशों द्वारा पारित किया गया है। यह ओजोन परत की संरक्षण के लिए एक फ्रेमवर्क के रूप में कार्य करता है। परन्तु इस समझौते में ओजोन परत को नष्ट करने वाले कारकों को कम करने के सम्बन्ध में कोई व्यवस्था नहीं की गयी है।

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