विश्व वन्यजीव फण्ड

नैरोबी में किया गया पहले सतत नीली अर्थव्यवस्था सम्मेलन 2018 का आयोजन

केन्या की राजधानी नैरोबी में पहले सतत नीली अर्थव्यवस्था सम्मेलन 2018 का आयोजन 26 से 28 नवम्बर के दौरान किया गया। इसकी थीम “नीली अर्थव्यवस्था तथा  सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा” थी। इस सम्मेलन का आयोजन केन्या द्वारा किया गया, कनाडा और जापान इस सम्मेलन का सह-आयोजक थे।

मुख्य बिंदु

इस सम्मेलन में विश्व भर से लगभग 4000 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। भारत की ओर से इस सम्मेलन में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने हिस्सा लिया। हिन्द महासागर में भारत की स्थिति सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इस सम्मेलन में विश्व वन्यजीव फण्ड, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन, अंतर्राष्ट्रीय सीबेड प्राधिकरण, विश्व बैंक तथा ओशन फाउंडेशन इत्यादि ने भी हिस्सा लिया।

नीली अर्थव्यस्था से अभिप्राय समुद्री संसाधनों का उपयोग विकास, रोज़गार तथा जीवन स्तर को बेहतर करने लिए करना है। इसमें समुद्री परिवहन, मतस्य पालन, नवीकरणीय उर्जा, कचरा प्रबंधन तथा पर्यटन शामिल है।

भारत के लिए नीली अर्थव्यवस्था का महत्त्व काफी अधिक है। भारत समुद्री अधोसंरचना, अंतर्देशीय जलमार्गों तथा तटीय शिपिंग इत्यादि का विकास कर रहा है। इसके लिए भारत ने “सागरमाला कार्यक्रम लांच किया है। इसका उद्देश्य समुद्री लोजिस्टिक्स तथा बंदरगाहों का विकास करना है। इसके लिए भारत का राष्ट्रीय दृष्टिकोण “SAGAR – Security and Growth for All in IOR” शब्द के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

 

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भारत में मृदा जैव विविधता संकटग्रस्त : विश्व वन्यजीव फण्ड

हाल ही में विश्व वन्यजीव फण्ड ने “Global Soil Biodiversity Atlas” जारी की, इसमें भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जो मृदा जैव विविधता के संकट से जूझ रहे हैं। इस एटलस को WWF की द्वि-वार्षिक “लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट” 2018 में जारी किया गया। इस रिपोर्ट में मृदा जैव विविधता तथा परागणकों को उत्पन्न खतरे पर प्रकाश डाला गया है। मृदा जैव विविधता तथा परागणकों का ह्रास प्राकृतिक संसाधनों तथा कृषि के अत्याधिक शोषण के कारण हुआ है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

मृदा विविधता : इसमें मृदा में विद्यमान सूक्ष्म जीवाणुओं तथा सूक्ष्म वनस्पति इत्यादि शामिल हैं।
लाखों सूक्ष्म जीवाणुओं व जीवों की सहायता से मृदा का निर्माण होता है, इसमें बैक्टीरिया, कवक इत्यादि होते हैं। जैव विविधता में जीन्स तथा प्रजातियाँ शामिल होती हैं।
मृदा में विविधता से कई प्रकार की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्राप्त होती है।
WWF के रिस्क इंडेक्स में प्रदूषण, अधिक पशु चारण, गहन कृषि, दावानल, मृदा अपरदन, मरुस्थलीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के खतरे को दर्शाया जाता है।
इस एटलस में भारत को मृदा अपरदन को गंभीर खतरे वाले देशों की सूची में रखा गया है, इस श्रेणी में पाकिस्तना, चीन, तथा अन्य कई देश शामिल हैं।
परगणक : भारत में 50 मिलियन हेक्टेयर  के लिए मधुमक्खियों की 150 कोलोनीज़ की आवश्यकता है, परन्तु भारत में केवल 1.2 मिलियन कोलोनीज़ ही मौजूद हैं।
पारिस्थितिकी नुकसान : 1970 के मुकाबले 2014 में मछली, स्तनधारी जीवों, उभयचर जीवों तथा रेंगने वाले जीवों की जनसँख्या में लगभग 60% की कमी आई है। इस अवधि में ताज़े-पानी की प्रजातियों में 83% की कमी आई है। 1970 से अब तक आर्द्रभूमि में 87% की कमी आई है।

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड फॉर नेचर (WWF)

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड फॉर नेचर एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है, यह संगठन वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कार्य करता है। इसकी स्थापना 29 अप्रैल, 1961 को की गयी थी। इसका मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के रुए मौवेर्नी में स्थित है। इस संगठन का उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण तथा पर्यावरण पर मानव के प्रभाव को कम करना है। WWF वर्ष1998 से प्रत्येक दो वर्ष बाद लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट प्रकाशित करता है।

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