साइबर अपराध

साइबर अपराध रिपोर्ट 2019 : मुख्य बिंदु

हाल ही में RSA सिक्यूरिटी (अमेरिकी कंप्यूटर व नेटवर्क सिक्यूरिटी कंपनी) ने “करेंट स्टेट ऑफ़ साइबर क्राइम -2019” नामक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में सोशल फ्रॉड में 43% की वृद्धि हुई है, रिपोर्ट में 2019 में भी इस ट्रेंड के जारी रहने के आसार हैं।

मुख्य बिंदु

  • फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्सएप्प, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म आपराधिक धोखेबाजी, साइबर अपराधियों के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं, इससे अपराधियों को वार्तालाप करने, क्रेडिट कार्ड के नंबर चुराने इत्यादि कार्यों में काफी आसानी होती है।
  • 2015 और 2018 में मोबाइल एप्प के ज़रिये किये जाने वाले फ्रॉड में 680% की वृद्धि हुई है।
  • इस रिपोर्ट में बढ़ती हुई फ्रॉड मोबाइल एप्प के बारे में चेतावनी दी गयी है।
  • इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साइबर अपराधी साइबर एक्टिविटी को और अधिक कुशल बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं।

सरकार द्वारा उठाये गये कदम

राष्ट्रीय साइबर समन्वय केंद्र (NCCC) : यह एक ऑपरेशनल साइबर सिक्यूरिटी तथा ई-सर्विलांस एजेंसी है, यह संचार का मेटाडाटा प्राप्त करती है और अन्य इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ मिलकर कार्य करती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् सचिवालय के अंतर्गत राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा समन्वयक (NCSC) साइबर सुरक्षा से सम्बंधित मामलों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय करती है।

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 लागू किया, इसके द्वारा इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन (संचार), इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स तथा साइबर अपराधों इत्यादि को कानूनी मान्यता दी गयी है। यह अधिनियम साइबर अपराधों को रोकने में काफी कारगर सिद्ध हुआ है।

देश की अति आवश्यक सूचना अधोसंरचना की सुरक्षा के लिए National Critical Information Infrastructure Protection Centre (NCIIPC) की स्थापना की गयी।

नागरिकों, व्यापार तथा सरकार के लिए भरोसेमंद व सुरक्षित साइबरस्पेस उपलब्ध करवाने के लिए राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति (2013) का निर्माण किया गया।

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सर्वोच्च न्यायालय ने आईटी अधिसूचना के लिए केंद्र को जारी किया नोटिस

हाल ही में केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी करके 10 केन्द्रीय एजेंसियों को भारत में किसी भी कंप्यूटर सिस्टम के डाटा को इंटरसेप्ट, मॉनिटर तथा डीक्रिप्ट करने की अनुमति दी थी। इस अधिसूचना के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को नोटिस जारी किया है ।

मुख्य बिंदु

जिन 10 एजेंसियों को यह निगरानी की अनुमति दी गयी है, वे इस प्रकार हैं : इंटेलिजेंस ब्यूरो, नारकोटिक्स, कण्ट्रोल ब्यूरो, राजस्व इंटेलिजेंस निदेशालय, सीबीआई, राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी (NIA), प्रवर्तन निदेशालय, केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, डायरेक्टरेट ऑफ़ सिग्नल इंटेलिजेंस (जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व तथा असम) तथा दिल्ली पुलिस।

सरकार के अनुसार यह अधिसूचना आईटी (सूचना के इंटरसेप्शन तथा मॉनिटरिंग प्रक्रिया) नियम, 2009 के नियम 4 की आवश्यकताओं को पूरा करती है। इसके अनुसार सरकार को डाटा के इंटरसेप्शन, मोनिटरिंग तथा डीक्रिप्शन के लिए एजेंसियों की सूची तैयार करनी पड़ती है ।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के द्वारा भारत में साइबर अपराध का प्रबंधन किया जाता है । सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में साइबर अपराध की छानबीन के लिए डाटा की मोनिटरिंग, इंटरसेप्शन तथा डीक्रिप्शन की व्यवस्था है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (सूचना के इंटरसेप्शन तथा मॉनिटरिंग प्रक्रिया), 2009 को सेक्शन के तहत अधिसूचित किया गया है ।

याचिकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए हैं :

  1. यह अधिसूचना अवैध व असंवैधानिक है।
  2. इस अधिसूचना का उपयोग राजनीती प्रतिद्वंदियों पर रोक लगाने के लिए जा रहा है, इसे भारतीय संविधान के तहत अनुमति नहीं दी जा सकती।
  3. यह अधिसूचना निजता के मूलभूत अधिकार के विरुद्ध है।
  4. इस अधिसूचना के द्वारा “निगरानी राज्य” के निर्माण का प्रयास किया जा रहा है।
  5. इस अधिसूचना के द्वारा सरकार सभी संचार, कंप्यूटर तथा मोबाइल के डाटा को अपनी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकती है।

सरकार ने राष्ट्र हित का हवाला देते हुए अपने आदेश का बचाव किया है और यह भी कहा कि यह UPA सरकार द्वारा 2009 में पारित किये गये नियमों की पुनरावृत्ति है।

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