पर्यावरण एवं पारिस्थिकी करेंट अफेयर्स

इस श्रेणी में हिन्दी भाषा में पर्यावरण एवं पारिस्थिकी करेंट अफेयर्स एवं समसामयिक घटनाक्रम का SSC, Railways, RAS/RPSC, BPSC, MPPSC, JPSC, HPSC, UPPSC, UKPSC एवं अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण समाचारों का संग्रह किया गया है।

भारत में मृदा जैव विविधता संकटग्रस्त : विश्व वन्यजीव फण्ड

हाल ही में विश्व वन्यजीव फण्ड ने “Global Soil Biodiversity Atlas” जारी की, इसमें भारत को उन देशों की सूची में रखा गया है जो मृदा जैव विविधता के संकट से जूझ रहे हैं। इस एटलस को WWF की द्वि-वार्षिक “लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट” 2018 में जारी किया गया। इस रिपोर्ट में मृदा जैव विविधता तथा परागणकों को उत्पन्न खतरे पर प्रकाश डाला गया है। मृदा जैव विविधता तथा परागणकों का ह्रास प्राकृतिक संसाधनों तथा कृषि के अत्याधिक शोषण के कारण हुआ है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

मृदा विविधता : इसमें मृदा में विद्यमान सूक्ष्म जीवाणुओं तथा सूक्ष्म वनस्पति इत्यादि शामिल हैं।
लाखों सूक्ष्म जीवाणुओं व जीवों की सहायता से मृदा का निर्माण होता है, इसमें बैक्टीरिया, कवक इत्यादि होते हैं। जैव विविधता में जीन्स तथा प्रजातियाँ शामिल होती हैं।
मृदा में विविधता से कई प्रकार की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्राप्त होती है।
WWF के रिस्क इंडेक्स में प्रदूषण, अधिक पशु चारण, गहन कृषि, दावानल, मृदा अपरदन, मरुस्थलीकरण तथा जलवायु परिवर्तन के खतरे को दर्शाया जाता है।
इस एटलस में भारत को मृदा अपरदन को गंभीर खतरे वाले देशों की सूची में रखा गया है, इस श्रेणी में पाकिस्तना, चीन, तथा अन्य कई देश शामिल हैं।
परगणक : भारत में 50 मिलियन हेक्टेयर  के लिए मधुमक्खियों की 150 कोलोनीज़ की आवश्यकता है, परन्तु भारत में केवल 1.2 मिलियन कोलोनीज़ ही मौजूद हैं।
पारिस्थितिकी नुकसान : 1970 के मुकाबले 2014 में मछली, स्तनधारी जीवों, उभयचर जीवों तथा रेंगने वाले जीवों की जनसँख्या में लगभग 60% की कमी आई है। इस अवधि में ताज़े-पानी की प्रजातियों में 83% की कमी आई है। 1970 से अब तक आर्द्रभूमि में 87% की कमी आई है।

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड फॉर नेचर (WWF)

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड फॉर नेचर एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है, यह संगठन वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कार्य करता है। इसकी स्थापना 29 अप्रैल, 1961 को की गयी थी। इसका मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के रुए मौवेर्नी में स्थित है। इस संगठन का उद्देश्य वन्यजीवों का संरक्षण तथा पर्यावरण पर मानव के प्रभाव को कम करना है। WWF वर्ष1998 से प्रत्येक दो वर्ष बाद लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट प्रकाशित करता है।

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मैमल्स ऑफ़ इंडिया : भारत में स्तनधारी जीवों की सूचना का नवीन संग्रह

मैमल्स ऑफ़ इंडिया भारत में स्तनधारी जीवों की सूचना का नवीन संग्रह है, इसका शुरुआत बेंगलुरु के राष्ट्रीय जैव विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों तथा शोधकर्ताओं ने की है। इस नागरिक-वैज्ञानिक रिपॉजिटरी की शुरुआत सितम्बर, 2018 में की गयी थी, यह भारत में इस प्रकार की पहली रिपॉजिटरी है।

मैमल्स ऑफ़ इंडिया : प्रमुख तथ्य

  • यह एक ऑनलाइन पोर्टल है, इसका उद्देश्य भारत में पाए जाने वाले सभी स्तनधारी जीवों को एकत्रित करके प्रकाशित करना है।
  • आम लोग mammalsofindia.org पर स्तनधारी जीवों के फोटो अपलोड कर सकते हैं, 25 अक्टूबर, 2018 तक 161 स्तनधारी प्रजातियों के 768 चित्र अपलोड किये जा चुके हैं।
  • इस पोर्टल पर मणिपुर के रेड सेरो,जम्मू-कश्मीर की लिंक्स, अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले की एशियाई गोल्डन कैट तथा ईस्ट कामेंग जिले से बिन्टूरोंग इत्यादि कई दुर्लभ प्रजातियों के चित्र अपलोड किये जा चुके हैं।
  • इस पोर्टल के द्वारा देश में विभिन्न स्तनधारी प्रजातियों के वितरण का पता चल सकेगा।
  • मैमल्स ऑफ़ इंडिया “बायोडायवर्सिटी एटलस” प्रोजेक्ट का हिस्सा है, “बायोडायवर्सिटी एटलस” प्रजाति आधारित बायो-इन्फार्मेटिक्स प्लेटफार्म है।

भारतीय जैव-विविधता के संरक्षण में नागरिक-वैज्ञानिक प्रोजेक्ट

भारत में नागरिक-वैज्ञनिक प्रोजेक्ट्स से काफी परिवर्तन आ रहा है, इन प्रोजेक्ट्स की सहायता से जैव-विविधता के बारे में वैज्ञानिक सूचना के संग्रहण में काफी सहायता मिलती है। इस प्रकार के प्रोजेक्ट्स से लोग पर्यावरण सम्बन्धी कार्यों के लिए सूचना एकत्रित करके प्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान दे सकते हैं। जैव-विविधता से सम्बंधित डाटा एकत्रीकरण में नागरिकों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।

भारत का क्षेत्रफल विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4% हिस्सा है, परन्तु भारत में विश्व की कुल स्तनधारी प्रजातियों में से 7-8% प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारत में स्तनधारी जीवों को 426 प्रजातियाँ पायी जाती हैं, यह विश्व की कुल स्तनधारी प्रजातियों का 8.86% है।

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GCF ने भारत के तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए 43 मिलियन डॉलर की राशि को मंज़ूरी दी

ग्रीन क्लाइमेट फण्ड (GCF) ने भारत के तटीय क्षेत्रों में निवास करने वाले समुदायों द्वारा जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए 43.4 मिलियन डॉलर की राशि को मंज़ूरी दे दी है। हाल ही में ग्रीन क्लाइमेट फण्ड ने निर्धन देशों में प्रोजेक्ट्स के लिए 1 अरब डॉलर की राशि को मंज़ूरी दे दी है। इस राशि का उपयोग 19 परियोजनाओं के लिए किया जायेगा। इस राशि का उपयोग विभिन्न देशों में भू-तापीय उर्जा तथा तटीय समुदायों के संरक्षण इत्यादि के लिए किया जायेगा।

मुख्य बिंदु

GCF द्वारा फण्ड किया जाने वाला यह प्रोजेक्ट बहु-आयामी है, इस प्रोजेक्ट के तहत आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा ओडिशा के संवेदनशील इलाकों पर फोकस किया जायेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत इन राज्यों को जलवायु परिवर्तन के मुताबिक समुदायों को ढालने तथा उत्सर्जन में कमी करने के लिए कार्य किया जायेगा। इसके अलावा स्थानीय समुदाय की आजीविका के लिए भी व्यवस्था की जाएगी। यह प्रोजेक्ट को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के द्वारा भी सहायता दी जाएगी। इस प्रोजेक्ट के तहत 15,000 हेक्टेयर क्षेत्र में मंग्रोव, कोरल रीफ, सीग्रास तथा नमक युक्त दलदल के संरक्षण के लिए कार्य किया जायेगा। इसके लिए स्थानीय युवाओं को वैज्ञानिकों के साथ कार्य करने के लिए प्रशिक्षण दिया जायेगा।

इसके अलावा इस कार्य में समन्वय के लिए सरकारी अफसरों, शैक्षणिक संस्थानों, सामुदायिक नेताओं तथा वैज्ञानिकों के लिए मोबाइल एप्प का निर्माण किया जायेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण तथा जन शिक्षा कार्यक्रम के द्वारा को जलवायु परिवर्तन तथा इसके खतरों से भी अवगत करवाया जायेगा।

प्रोजेक्ट का महत्व

इस प्रोजेक्ट के द्वारा स्थानीय समुदाय को जलवायु के अनुकूल अजीविका के साधन प्राप्त होंगे तथा इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आएगी। इकोसिस्टम (उपरोक्त वर्णित कार्य) के द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 3.5 मिलियन टन की कमी आएगी। इससे पारिस्थितिकी तंत्र को भी दीर्घकाल में लाभ होगा। यह पेरिस समझौते तथा 2030 सतत विकास अजेंडे के लक्ष्यों को प्राप्त करने में काफी सहायक सिद्ध होगा।

पृष्ठभूमि

भारत के तटवर्ती क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से काफी संवेदनशील हैं। भारत की तटरेखा जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है।बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में इसका काफी असर पड़ेगा, इन क्षेत्रों में विपरीत मौसमी परिस्थितियां जैसे चक्रवात इत्यादि की प्रवृत्ति काफी बढ़ जाएगी। भारत में लगभग 6,740 वर्ग किलोमीटर का मंग्रोव क्षेत्र है। कुछ क्षेत्रों में मंग्रोव में मानवीय गतिविधियों के कारण 50% की कमी आ गयी है, जलस्तर के बढ़ जाने के कारण इसमें और कमी होने की सम्भावना है।

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