प्राचीन भारतीय इतिहास : 13 – बौद्ध धर्म का उदय

बौद्ध धर्म की स्थापना छठवीं शताब्दी में गौतम बुद्ध द्वारा की गयी थी। बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल के लुम्बिनी में हुआ था। उनकी मृत्यु 483 ईसा पूर्व में भारत में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में हुई थी। आरम्भ में बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के विभिन्न हिस्सों में हुआ। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे कई शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म में प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धीरे-धीरे इस धर्म का विस्तार दक्षिण-पूर्व एशिया, तथा चीन व जापान में हुआ।

बौद्ध धर्म की मान्यताएं

बौद्ध धर्म में वैदिक धर्म और जैन धर्म से काफी समानताएं हैं। वैदिक व जैन धर्म की तरह ही बौद्ध धर्म में मोक्ष प्राप्ति को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य बताया गया है। जैन धर्म की भाँती आरंभ में बौद्ध धर्म में भी मूर्ति पूजा नहीं की जाती थी, परन्तु बाद में बौद्ध धर्म में भी मूर्ति पूजा शुरू हो गयी।

बुद्ध ने पुरातनवादी दृष्टिकोण का खंडन किया, जो नयी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के स्थायित्व और नए विचारों के उदय में अवरोध उत्पन्न कर रहा था। बुद्ध ने जातिगत वर्ण व्यवस्था व कर्मकांडों का खंडन किया था। जैन धर्म की भाँती बौद्ध धर्म में भी अहिंसा का सिद्धांत काफी महत्वपूर्ण है।

अष्टांगिक मार्ग

बुद्ध के अनुसार इच्छाएं मनुष्य के जीवन में दुखों का कारण है। इन दुखों से मुक्ति पाने और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग एक महत्वपूर्ण साधन है। अष्टांगिक मार्ग निम्नलिखित हैं :

  1. सम्यक दर्शन – चार सत्य पर विश्वास
  2. सम्यक संकल्प – मानसिक और नैतिक विकास का संकल्प
  3. सम्यक वाक् – झूठ न बोलना तथा वाणी से किसी को कष्ट न पहुँचाना
  4. सम्यक कर्म – किसी को अपने कर्म से पीड़ा न पहुँचाना
  5. सम्यक जीविका – जीविकोपार्जन से किसी अन्य को हानि न हो
  6. सम्यक प्रयास – स्वयं को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत रहना
  7. सम्यक स्मृति – ज्ञान को समझाने के लिए बुद्धि उपयोग
  8. सम्यक समाधी – निर्वाण प्राप्त करना

बौद्ध धर्म का विकास

बौद्ध धर्म की उत्पत्ति के बाद इसे कई शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ, जिसके परिणामस्वरुप बौद्ध धर्म का विस्तार भारत के अतिरिक्त दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा सुदूर पूर्व के देशों में संभव हो सका। बौद्ध धर्म के विस्तार में सम्राट अशोक की भूमिका अति महत्वपूर्ण थी। अलग-अलग समय काल में 4 प्रमुख बौद्ध संगीतियों का आयोजन किया गया।

प्रथम बौद्ध संगीति

प्रथम बौद्ध संगीति राजगृह में आयोजित की गयी थी, इसका अध्यक्ष महाकस्सप था। इसका आयोजन 483 ईसा पूर्व अजातशत्रु के कार्यकाल में किया गया था। इस संगीति में  विनय और धर्म का संग्रह किया गया। इसमें बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन किया गया था। और उन्हें सुत्त व विनय नामक दो पिटकों में वर्गीकृत किया गया।

द्वितीय बौद्ध संगीति

द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन 383 ईसा पूर्व वैशाली में सुबुकामी की अध्यक्षता में किया गया था। उस समय  कालाशोक मगध का शासक था। इस संगीति में बौद्ध धर्म के विभाजन महासंघिक और स्थविरवाद में हो गया।

तृतीय बौद्ध संगीति

तृतीय बौद्ध संगीति पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक के कार्यकाल में 247 ईसा पूर्व आजोयित की गयी। इसमें अभिधम्म पिटक को जोड़ा गया, तथा कथावस्तु का संकलन किया गया। इस संगीति में स्थाविरवाद सम्प्रदाय का प्रभुत्व था। मोग्लिपुत्ततिस्य इस संगीति का अध्यक्ष था।

चौथी बौद्ध संगीति

चतुर्थ बौद्ध संगीति कश्मीर के कुंडलवन में 102 ईसा पूर्व में हुई, इस संगीति का अध्यक्ष वासुमित्र था, जबकि उपाध्यक्ष अश्वघोष था। यह संगीति सम्राट कनिष्क के कार्यकाल में हुई। इस संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान नामक दो सम्प्रदायों में बंट गया। इस दौरान संस्कृत भाषा का उपयोग वृहत स्तर पर किया गया। इस दौरान विभाषाशास्त्र नामक ग्रन्थ की रचना की गयी। यह अंतिम बौद्ध संगीति थी।

बौद्ध धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय

थेरवाद/हीनयान

हीनयान अथवा थेरवाद सम्प्रदाय में वे लोग शामिल हैं जो प्रमुखतः रूढ़ीवादी विचारधारा से सम्बंधित हैं। वे बुद्ध की शिक्षाओं को ज्यों का त्यों पालन करने में विशवास रखते हैं। वे बुद्ध की शिक्षा परिवर्तन के पक्षधर नहीं थे। इस सम्प्रदाय के अनुसार बुद्ध महापुरुष अवश्य हैं, परन्तु वे देवता नहीं हैं। इस सम्प्रदाय के अनुयायी बुद्ध की पूजा नही करते। इस मत की उत्पत्ति कश्मीर में हुई थी, यह सौतांत्रिक तंत्र मन्त्र से सम्बंधित था। इस साम्प्रादय में साधना अत्याधिक कठोर थी। हीनयान सम्प्रदाय में भिक्षु जीवन जीने पर बल दिया जाता है। धर्मत्रात, घोषक, वसुमित्र, बुद्धदेव इत्यादि इस संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे।

हीनयान सम्प्रदाय में बुद्ध के जीवन से चार पशु जुड़े हुए हैं। बुद्ध के गर्भ में आने का प्रतीक हाथी को माना जाता है, यौवन का प्रतीक सांड, गृह त्याग का प्रतीक घोडा और समृद्धि का प्रतीक शेर को माना जाता है। आगे हीनयान भी दो सम्प्रदायों वैभाष्क और सौत्रान्तिक में बंट गया।

हीनयान के अन्य मुख्य सम्प्रदाय निम्नलिखित हैं :

  • स्थाविरवादी
  • सर्वास्तिवादी
  • समित्या

महायान सम्प्रदाय

महायान सम्प्रदाय के मतानुसार निर्वाण के लिए व्यक्ति को किसी गुरु की आवश्यकता पड़ती है। प्रेरणा और सहायता के लिए बोधिसत्व को माना जाता है, बोधिसत्व को निर्वाण प्राप्त होते हैं। महायान बौद्ध मत के दो अन्य सम्प्रदाय हैं – शून्यवाद और माध्यमिका एवं विज्ञानवाद या योगाचार।

शून्यवाद

इस मत के प्रवर्तक नागार्जुन थे, उनकी प्रसिद्ध रचना माध्यमिककारिका है। शून्यवाद से तात्पर्य विचार शून्यता व अस्तित्व शून्यता से है। चन्द्रकीर्ति, शांतिदेव, आर्यदेव और शांतिरक्षित इस मत के प्रमुख विद्वान थे। बुद्धपालित और भावविवेक पांचवी सदी में शून्यवाद के महत्वपूर्ण भाषाकार थे।

विज्ञानवाद

विज्ञानवाद मत का विकास तीसरी सदी में मैत्रेयनाथ द्वारा किया गया था। यह मत केवल विज्ञान की ही एक मात्र सत्ता को स्वीकार करता है। इसमें योगाभ्यास और आचरण पर विशेष बल दिया गया है। असंग द्वारा लिखा गया सूत्रलंकार इस धर्म से सम्बंधित प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसका सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ लंकावतार सूत्र है।

बोधिसत्व

दस पारमिताओं का पूर्ण पालन करने वाला बोधिसत्व कहलाता है। बोधिसत्व का लक्ष्य बुद्धत्व को प्राप्त होना है। तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुसार, बोधिसत्व मानव द्वारा जीवन में प्राप्त करने योग्य चार उत्कृष्ट अवस्थाओं में से एक है। महायान में अनके बोधिसत्वों की परिकल्पना की गयी है। बोधिसत्व ज्ञान मार्ग पर चलने वाले लोगों की सहायता करते हैं।

सबसे प्रतिष्ठित बोधसत्व को देवता समान माना जाता है, वे हैं – अवलोकितेश्वर, मंजूश्री, वज्रपाणी, आकाशगर्भ, सामंतभद्र, भैषज्यराज और मैत्रेय। देवती तारा जो प्रज्ञा की अवतार हैं। कुछ मूर्तियों में बोधिसत्व के साथ दिखाई गयी हैं। इसे प्रज्ञापारमिता भी कहा जाता है। महायान के अनुयायी प्रज्ञापारमिता, मंजूश्री और अवलोकितेश्वर की उपासना करते थे।

 

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