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ISRO-JAXA ने चन्द्र ध्रुवीय अन्वेषण (Lunar Polar Exploration) पर सहयोग की समीक्षा की

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) ने 11 मार्च, 2021 को पृथ्वी अवलोकन, चंद्र सहयोग और उपग्रह नेविगेशन सहित सहयोग की समीक्षा की।

मुख्य बिंदु

दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने “अंतरिक्ष स्थिति संबंधी जागरूकता और पेशेवर विनिमय कार्यक्रम” (Space Situational Awareness and Professional Exchange Programme) में सहयोग के बारे में अवसरों का पता लगाने के लिए भी सहमति व्यक्त की। एजेंसियों ने उपग्रहों के डेटा का उपयोग करके चावल फसल क्षेत्र और वायु गुणवत्ता निगरानी पर गतिविधियों के लिए सहयोग करने के लिए कार्यान्वयन व्यवस्था पर हस्ताक्षर किए।

LUPEX मिशन

LUPEX मिशन का अर्थ (Lunar Polar Exploration Mission) है जिस पर भारत और जापान पहले से ही काम कर रहे हैं। दोनों एजेंसियां ​​इस मिशन पर काम कर रही हैं और वर्ष 2024 तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर और रोवर भेजने का लक्ष्य रखा है।

चंद्रमा मिशनों पर भारत के सहयोग

हाल ही में, अंतरिक्ष विज्ञान, पृथ्वी अवलोकन, रोबोट और मानव अन्वेषण में अवसरों का पता लगाने के लिए भारत ने इटली के साथ सहयोग किया था। फरवरी 2021 के महीने में, भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसने मौजूदा एमओयू में संशोधन किया था। यह समझौता व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर निर्माण करेगा।

गगनयान

यह भारत का मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम है। इसे तीन लोगों को ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का पहला क्रू मिशन होगा। यह अंतरिक्ष यान दो या तीन-व्यक्ति के साथ सात दिन तक 400 किमी की ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करेगा। इस मिशन को दिसंबर 2021 में इसरो के GSLV Mk III पर लॉन्च करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन इसे 2023 तक स्थगित कर दिया गया है। क्रू मॉड्यूल का निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा किया जा रहा है, जबकि इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा डिजाइन किया गया है। DRDO क्रिटिकल हेल्थकेयर, स्पेस ग्रेड फूड, सुरक्षित रिकवरी के लिए पैराशूट जैसी महत्वपूर्ण मानव-केंद्रित प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों के लिए सहायता प्रदान करेगा।

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2022 में लांच किया जायेगा चंद्रयान-3

हाल ही में इसरो के चेयरमैन के. सिवान ने कहा कि कोरोनावायरस महामारी ने इसरो के कई प्रोजेक्ट्स को प्रभावित किया है, इसमें चंद्रयान-3 और गगनयान शामिल हैं। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन वर्ष 2022  में चंद्रयान-3 को लांच करने के लिए कार्य कर रहा है। हालाँकि यह मिशन वर्ष 2020 में लांच किया जाना था, परन्तु कोरोनावायरस के चलते कार्य में काफी देरी हुई है। चंद्रयान-3 में चन्द्रमा की सतह पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग की जायेगी।

चंद्रयान-3 में एक लैंडर और एक रोवर होगा, सीमे ऑर्बिटर नही होगा। क्योंकि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चन्द्रमा की कक्षा में कार्य कर रहा है और यह आने वाले 5-6 वर्ष तक कार्य करता रहेगा।

मिशन चंद्रयान-2

चंद्रयान-2 भारत का चंद्रमा पर दूसरा मिशन है, यह भारत का अब तक का सबसे मुश्किल मिशन था। यह 2008 में लांच किये गए मिशन चंद्रयान का उन्नत संस्करण था। चंद्रयान मिशन ने केवल चन्द्रमा की परिक्रमा की थी, परन्तु चंद्रयान-2 मिशन में चंद्रमा की सतह पर एक रोवर भी उतारा जाना था। इसरो का चंद्रयान-2 मिशन चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में नाकाम रहा था। सॉफ्ट लैंडिंग के समय इसरो का लैंडर विक्रम से सम्पर्क टूट गया था।

इस मिशन के सभी हिस्से इसरो ने स्वदेश रूप से भारत में ही बनाये हैं, इसमें ऑर्बिटर, लैंडर व रोवर शामिल है। इस मिशन में इसरो पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड रोवर को उतारने की कोशिश की। यह रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करके चन्द्रमा की सतह के घटकों का विश्लेषण करने के लिए निर्मित किया गया था।

चंद्रयान-2 को GSLV Mk III से लांच किया गया। यह इसरो का ऐसा पहला अंतर्ग्रहीय मिशन है, जिसमे इसरो ने किसी अन्य खगोलीय पिंड पर रोवर उतारने का प्रयास किया। इसरो के स्पेसक्राफ्ट (ऑर्बिटर) का वज़न 3,290 किलोग्राम है, यह स्पेसक्राफ्ट चन्द्रमा की परिक्रमा करके डाटा एकत्रित करेगा, इसका उपयोग मुख्य रूप से रिमोट सेंसिंग के लिए किया जा रहा है।

6 पहिये वाला रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करके मिट्टी व चट्टान के नमूने इकठ्ठा करने के लिए बनाया गया था, इससे चन्द्रमा की भू-पर्पटी, खनिज पदार्थ तथा हाइड्रॉक्सिल और जल-बर्फ के चिन्ह के बारे में जानकारी मिलने की सम्भावना थी।

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ग्रीन प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी विकसित कर रहा है इसरो

इसरो “ग्रीन प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी” विकसित कर रहा है। यह टेक्नोलॉजी भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन  गगनयान के लिए विकसित की जा रही है, जिसे दिसंबर 2021 में लॉन्च किया जाना है।

प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी क्या है?

प्रोपल्शन का मतलब होता है आगे बढ़ना या किसी वस्तु को आगे बढ़ाना। रॉकेट और हवाई जहाज में, न्यूटन के तीसरे नियम के द्वारा प्रणोदन उत्पन्न किया जाता है। इसके द्वारा राकेट या हवाई जहाज़ उड़ान भरता है।

इसरो की ग्रीन प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी

  • इसरो ने 2018 में ग्रीन प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी विकसित करने का कार्य शुरू किया था। इसरो ने 2018 में एक इको-फ्रेंडली सॉलिड प्रोपेलेंट ग्लाइसीडाइल एज़ाइड पॉलिमर जीएपी को ईंधन के रूप में और अमोनियम डी-नाइट्रामाइड को ऑक्सीडाइज़र के रूप में विकसित किया था।
  • इसरो केरोसिन, हाइड्रोजन पेरोक्साइड, लिक्विड ऑक्सीजन, और ग्लिसरॉल-वाटर, और मेथनॉल-वाटर जैसे ग्रीन प्रोपल्शन पर कार्य कर रहा है।
  • इसरो ने लॉन्च व्हीकल के लिए लिक्विड ऑक्सीजन, लिक्विड हाइड्रोजन आधारित प्रणोदन प्रणाली का परीक्षण शुरू कर दिया है।
  • इसरो ने पहले ही अपने मिशन में ग्रीन प्रोपल्शन टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया है।हालाँकि, तकनीकों का उपयोग केवल मिशन के एक हिस्से में ही किया जाता है। उदाहरण के लिए, लिक्विड ऑक्सीजन, प्रोपल्शन के लिक्विड हाइड्रोजन संयोजन का उपयोग जीएसएलवी एमके- III वाहन के क्रायोजेनिक उपरी चरणों में किया जाता है।
  • इसरो ने ISORENE विकसित किया है।ISORENE केरोसिन का रॉकेट ग्रेड संस्करण है। यह पारंपरिक हाइड्रेंजाइन रॉकेट ईंधन का एक विकल्प है।
  • इसरो ने अपने साउथ एशिया सैटेलाइट में इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम का सफल प्रदर्शन किया जो मई 2017 में लॉन्च किया गया था।

साउथ एशिया सैटेलाइट

इसे जीसैट-9 भी कहा जाता है। इस उपग्रह को इसरो द्वारा सार्क क्षेत्र के लिए संचालित किया जाता है। यह उपग्रह श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और मालदीव में कार्य करता है। ओस कार्यक्रम में पाकिस्तान शामिल नहीं है।

पाकिस्तान ने GSAT-9 को तकनीकी और मौद्रिक सहायता की पेशकश की। थी हालांकि, भारत ने प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह सहयोगी आधार पर उपग्रह विकसित करने के लिए तैयार नहीं है।

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