चन्द्रगुप्त मौर्य

चन्द्रगुप्त मौर्य भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण शासक था। चन्द्रगुप्त मौर्य के कार्यकाल से पहले सिकंदर ने भारत पर आक्रमण करके कई क्षेत्रों को अपने अधीन किया था। सिकंदर ने अपने जीते हुए क्षेत्रों में अपने प्रतिनिधियों को रखा था। मौर्य वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने की थी, इसमें चाणक्य ने उसकी सहायता की थी। बौद्ध और जैन ग्रंथों में मौर्यों को क्षत्रिय बताया गया है जबकि ब्राह्मण ग्रंथों में इन्हें शूद्र बताया गया है। यूनानी लेखकों के विवरण से ज्ञात होता है कि मौर्य साधारण कुल से सम्बंधित थे।
चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधान मंत्री चाणक्य थे, चाणक्य ने कूटनीति का उपयोग करके मौर्य साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशाखादत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस से चन्द्रगुप्त मौर्य और चाणक्य की गतिविधियों के पता चलता है। यूनानी विवरण में चन्द्रगुप्त का नाम अलग-अलग मिलता है जैसे एरिएन, स्ट्रेबो इत्यादि। जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए सेंड्रोकोट्स, एप्पीनायस और प्लूटार्क ने एंडरोकोट्स जैसे नामों का उपयोग किया है। सर्वप्रथम 28 फरवरी, 1793 में सर विलियम जोंस ने उपर्युक्त यूनानी नामों की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य से की।
चाणक्य के सहयोग से चन्द्रगुप्त ने सर्वप्रथम उत्तर पश्चिम सीमा को जीता, क्योंकि सिकंदर के बाद अव्यवस्था फैली हुई थी। पश्चिमोत्तर क्षेत्र की विजय के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ने पर मगध पर विजय प्राप्त की और नन्द वंश के अंतिम शासक धनानंद की हत्या कर नन्द वंश को समाप्त किया।
चंद्रगुप्त-सेल्यूकस युद्ध- 304-05 ईसा पूर्व चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के बीच युद्ध हुआ, इस युद्ध में चन्द्रगुप्त मौर की विजय हुई। चन्द्रगुप्त मौर्य तथा सेल्यूकस के बीच संधि का वर्णन यूनानी विद्वान् प्लूटार्क ने किया है। सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य से अपनी पुत्री हेलेना का विवाह करवाया और साथ ही एरिया, अरकोशिया, जेडरोशिया और पेरीपेमिस दाई जैसे क्षेत्र उसे दिए। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिए, सेल्यूकस का राजदूत मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया। बाद में मेगास्थनीज़ ने इंडिका नामक पुस्तक की रचना की थी।
रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में चन्द्रगुप्त के नाम का ज़िक्र किया गया है, संभवतः उसने सौराष्ट्र और अन्य पश्चिमी क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की होगी, इस क्षेत्रों में पुष्यगुप्त ने सुदर्शन झील का निर्याम करवाया था। सौहगोरा ताम्र पत्र तथा महास्थान अभिलेख से इन क्षेत्रों पर चन्द्रगुप्त मौर्य के अधिकार की पुष्टि होती है। तमिल साहित्य में अहनागुरु और फुरनागुरु से दक्षिण भारत में भी में चन्द्रगुप्त मौर्य के आधिपत्य का ज्ञान होता है। जीवन के अंतिम दिनों चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म स्वीकार किया। उसने श्रवणगोलबेला में जैन पद्धति के अनुसार अपने प्राण त्यागे।
चन्द्रगुप्त मौर्य ने सर्वप्रथम भारत के इतने बड़े क्षेत्र को एकीकृत किया। चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य दक्षिण भारत को छोड़कर समस्त भारतीय महाद्वीप में फैला हुआ था, यह भारतीय इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक था।

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