मराठा प्रशासन
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केन्द्रीय प्रशासन
शिवाजी का शासन हिन्दू धर्म पर आधारित था। उनका साम्राज्य दो भागों में विभाजित था। जिस भाग पर मराठों का प्रत्यक्ष नियंत्रण था, उसे स्वराज अथवा मुल्क-ए-कादिम कहा जाता था। कुछ अन्य क्षेत्रों पर भी मराठों का अधिकार था, परन्तु इन क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष शासन के स्थान पर चौथ वसूली जाती थी।
मराठा साम्राज्य में राजा का पास अधिक शक्तियां थी, उस पर कोई भी अंकुश नहीं था। वे अपने साम्राज्य का सर्वोच्च सेनापति होता था। वह राज्य का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी भी होता था। राजा की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद् की नियुक्ति की जाती थी। शिवाजी के शासनकाल में मंत्रिपरिषद को अष्टप्रधान कहा जाता था। हालांकि इस मंत्रिपरिषद के पास अधिक शक्तियां नहीं होती थी, यह केवल राजा को सलाह देती थी। अष्टप्रधान में न्यायधीश और पंडितराव के अतिरिक्त अन्य सभी मंत्री सैन्य गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं।
अष्टप्रधान के सदस्य
पेशवा
यह अष्टप्रधान का मुख्य सदस्य था, यह प्रधानमन्त्री की भांति कार्य कारता था। पेशवा पूरे साम्राज्य के सामान्य प्रशासन का कार्य करता था।
अमात्य
यह राज्य के वित्तीय कार्य करता था। यह राजस्व सम्बन्धी कार्य भी करता था।
वाकियानवीस
यह राज्य के आंतरिक मामलों का प्रबंधन करता था। यह राज्य की सुरक्षा के सम्बन्धी कार्य संभालता था। यह राज्य की गुप्तचर व्यवस्था सम्बन्धी कार्य भी करता था।
शुरूनवीस
यह पत्राचार का कार्य करता था। यह परगने के हिसाब-किताब सम्बन्धी कार्य भी करता था।
दबीर
यह विदेश मंत्री का कार्य करता था। दबीर मराठा साम्राज्य के अन्य राज्यों से संबधों का प्रबंधन भी करता था।
सर-ए-नौबत
यह राज्य के सैन्य कार्यों का निर्वहन करता था।
पंडितराव
यह राज्य के धार्मिक मामलों का प्रबंधन करता था।
न्यायधीश
मराठा साम्राज्य का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी राजा होता था, राजा के बाद न्यायधीश मुख्य न्यायिक अधिकारी होता था।
प्रांतीय प्रशासन
प्रशासनिक कुशलता के लिए मराठा साम्राज्य को छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। मराठा साम्राज्य का विभाजन राज्य, प्रांत में किया गया था। प्रांत का प्रशासन सरसूबेदार द्वारा संभाला जाता था। प्रांत को भी आगे महालों में विभाजित किया गया था, इसका मुख्य प्रशासनिक अधिकारी सरहवलदार होता था। महाल का विभाजन तर्फ में किया गया था, इसका प्रशासन हवलदार द्वारा संभाला जाता था। मराठा साम्राज्य में गाँव सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई होती थी, इसका प्रशासनिक कार्य पाटिल द्वारा किया जाता था, ग्रामीण प्रशासन में इसका सहयोग कुलकर्णी द्वारा किया जाता था। यह प्रशासनिक विभाजन राजस्व एकत्रीकरण के लिए भी काफी उपयोगी था।
मराठा साम्राज्य में राजस्व व्यवस्था
मराठा साम्राज्य में राज्य की आय का मुख्य स्त्रोत भू-राजस्व था। इस दौरान भूमि के माप के लिए काठी तथा ज़रीब का उपयोग किया जाता था। वर्ष 1670 ईसवी में मराठा साम्राज्य में बड़े पैमाने पर भू-सर्वेक्षण किया गया था। शिवाजी ने चुंगी तथा अन्य करों को समाप्त कर दिया था। परन्तु इस दौरान कर की दर काफी ऊँची थी, शिवाजी के शासनकाल में राजस्व की दर 40% थी। मराठा साम्राज्य में प्रचलित मुख्य कर निम्नलिखित हैं :
चौथ
यह कर मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से वसूला जाता था। इस कर के एवज में मराठा साम्राज्य द्वारा यह राज की कुल आय का एक चौथाई हिस्सा होता था।
सरदेशमुखी
सरदेशमुखी कर भी मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से वसूला जाता था, यह राज्य की कुल आय का 10% होता था।
पतदाम
मराठा शासन में विधवा पुनर्विवाह पर लगाये गए कर कर को पतदम कहा जाता था।
कर्जापट्टी
यह कर ज़मींदारो पर आरोपित किया जाता था।
मराठा प्रशासनिक अधिकारी
मजूमदार- राज्य की आय-व्यय का लेखापरीक्षक
मिरासदार- जमींदार
पाटिल/पटेल- गाँव का मुख्य अधिकारी, यह ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक, राजस्व तथा न्यायिक कार्य करता था।
कुलकर्णी- यह पाटिल का सहायक होता था।
मामलतदार- यह ग्रामीण क्षेत्रों में राजस्व निर्धारण सम्बन्धी कार्य करते थे।
देशमुख- मामलत इनके अधीनस्थ होते थे।
देशपांडे- राजस्व तथा वित्तीय अधिकारीयों द्वारा किये गए लेखा सम्बन्धी कार्य का निरीक्षण देशपांडे द्वारा किया जाता था।