बारिसल षड़यंत्र केस

बारिसल षड़यंत्र केस ने भी क्रांतिकारियों की उत्कृष्ट योजना को देखा। बारिसल (अब बांग्लादेश में) में लगभग 1904 में एक समिति स्थापित की गई थी जिसे बारिसल समिति के नाम से जाना जाता है। यह ‘ढाका अनुशीलन समिति’ का कार्य था। इसके प्रमुख को जिला आयोजक के रूप में जाना जाता था और जतिन घोष

राजा बाजार बम केस, 1913

राजा बाजार बम मामले में 27 मार्च 1913 को सिलहट में मौलवी बाजार में एक बम फेंका गया था। इसके बाद कमरा नंबर 296-1, अपर सर्कुलर रोड (स्थानीय नाम राजा बाजार) की नवंबर 1913 में तलाशी ली गई। ससना शेखर हजारा उर्फ ​​अमृत लाल हजारा , दिनेश चंद्र सेन गुप्ता, चंद्र शेखर डे और सरदा

1915-1921 के दौरान सेलुलर जेल, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में निर्वासन

प्रथम विश्व युद्ध के बाद की अवधि के दौरान निर्वासन और दंड में भारी वृद्धि हुई थी। भारतीय इन उत्पीड़कों को बाहर करने के लिए आक्रोशित थे। भारत सरकार ने गवर्नर ओ` ड्वायर की बलहीन दलीलों और निराशाजनक परिस्थितियों के तहत भारत सरकार अधिनियम (1915) को पारित कर दिया था, जिसके द्वारा क्रांतिकारी अपराधों के

मांडले षड़यंत्र केस

मांडले षड़यंत्र मामलों में सजा पाए कई अन्य ग़दर नेताओं को भी अंडमान में ले जाया गया। ग़दर आंदोलन के नेता जो बर्मा पहुंचे थे, वो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रशंसनीय प्रदर्शन कर रहे थे। पंडित सोहन लाल पाठक ने रंगून (बर्मा) में आर्मी स्कूल में शिक्षक कृपाराम के साथ दोस्ती की

लाहौर षड्यंत्र केस, 1915

लाहौर षड़यंत्र केस 26 अप्रैल 1915 को शुरू हुआ था, जिसमें राश बिहारी बोस (17 फरारियों में से एक) सहित 82 व्यक्तियों को सूचीबद्ध किया गया था, और उसी वर्ष 13 सितंबर तक जारी रहा। उनके खिलाफ प्रमुख आरोप यह था कि वे ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ते थे और भारत में ब्रिटिश सरकार